अपने आप को जानने का भाव आना चाहिए तभी अपना कल्याण कर सकते हो प्रमाण सागर महाराज

धर्म

अपने आप को जानने का भाव आना चाहिए तभी अपना कल्याण कर सकते हो प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
प्रभु के दर्शन करते समय अपने आपको पहचानो प्रभु जो आप हो वही तो में हुं? अपने आपको जानने के भाव जागना चाहिये तभी आप अपना कल्याण कर सकते हो”

 

 

उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने “भक्तामर” स्त्रोत्र के रहस्य को खोलते हुये प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये*
“को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निर्वकाशतया मुनिष !
दोषै-रूपत्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि”
मुनि श्री ने गाथा के रहस्य को खोलते हुये कहा कि “है भगवन् आपके स्वरुप में और मेरे स्वरुप में कोई अंतर नहीं है मैं खोज रहा था भगवान को और भगवन् आप खोज रहे थे मुझे आज जब मुझे अपने स्वरुप का ज्ञान हुआ तो आप मिल गये मुझे”

 

उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि एक करोड़ पति बाप का इकलौता बच्चा किसी मेले में गुम गया और वह किसी भिखारी को मिला भिखारी ने उसे पाला पोसा और उसे भी भिखारी बना दिया वह भिखारी एक दिन भीख मांगते मांगते सेठजी की हवेली में पहुंच गया सेठानी की उस पर नजर पड़ी उसका मातृत्व जागा और वह अपने बेटे को पहचान गयी उसने सेठजी को बुलाया और कहा कि यह भिखारी आपका ही 12 साल पहले गुम हुआ बेटा चिद्रूप है देखो इसके गले में पहना ताबीज अभी तक है तथा इसको बचपन में जो गुदना करवा कर नाम चिद्रुप लिखाया था वह भी लिखा हुआ है ।

 

 

सेठजी ने उस भिखारी को देखा और जब उसका चहरा अपने से मिलता हुआ पाया तो उसने उस भिखारी को गले से लगा लिया, कल तक अपने आपको भिखारी समझने वाले को जब अपने असली स्वरुप की जानकारी हो गयी तो वह भी जाकर अपनी मां तथा पिता के गले लग स्वं सेठ बन गया।

 

मुनि श्री ने कहा कि भगवान के सामने जाकर अपने स्वरुप का अपनी भगवत्ता का बोध करो और जब। असली स्वरूप की पहचान हो जाये तो मनोवृति भी बदल जाना चाहिये। मुनि श्री ने कहा कि “भगवान तो गुणों के भंडार है, रत्नों की खान है उनके दर्शन से हमें अपनी पहचान हो गयी और अपने स्वरुप को पहचान कर दोषों का भान हो गया तो समझना हमें सच्चा सम्यक् दर्शन मिल गया।

 

मुनि श्री ने कहा कि प्रभु पतित पावन की स्तुति रोज रोज आप लोग रटन तोता जैसे पड़ते हो यदि वही स्तुती भाव सहित पड़ोगे तो इसी में ही आपको सभी शास्त्रों का सार मिल जाएगा।

 

मुनि श्री संधान सागर जी महाराज कल्याण भवन के जिन मंदिर में मुलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के पादमुल मे बैठकर प्रतिमायोग का ध्यान लगा रहे है प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मुनि श्री पहले भी 36/48/72 घण्टे तक प्रतिमा योग लगाकर बैठ चुके है।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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