व्यक्ति की समीक्षा नहीं होती है विचारों की समीक्षा होती है प्रमाण सागर महाराज
इंदौर।
“व्यक्ति की समीक्षा नहीं होती विचारों की समीक्षा होती है” “जित देखूँ तित तू” यह भक्त की दृष्टि है,यदि वह अपने इष्ट को सर्वोच्च स्थान पर देखता है तो इसका मतलब यह नहीं कि, हमारे इष्ट ही सर्वश्रेष्ठ है, बाकी सब अश्रैष्ठ या तुच्छ है,यह मात्र भक्त की प्रभु के प्रति भक्ती की अभिव्यक्ति है” जैन धर्म “अनेकांत” का उपासक है एवं समग्र चिंतन है।
उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने आचार्य मानतुंगाचार्य के महाकाव्य “भक्तामर स्त्रोत्र” पर व्याख्यान देते हुये व्यक्त किये उन्होंने अनेकांत तथा एकांत की चर्चा करते हुये कहा कि आचार्य मानतुंगाचार्य भगवान की भक्ती में लीन है और कह रहे है कि मेंने अन्य सभी दर्शनों का भी अध्यन किया तथा “अनेकांत” जैन दर्शन का भी अध्यन किया तो मेंने अनेकांत मूलक इस दर्शन में सारी समस्याओं का समाधान पाया
उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि मीराबाई प्रभु भक्ती में लीन होकर कह रही है कि “मेरा तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई” इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी और के प्रति अपनी अवज्ञा या अनादर का भाव कर रही है,यह तो उनके अपने ईष्ट के प्रति भक्ती की चरम सीमा है।उसी प्रकार आचार्य श्री भगवान आदिनाथ की भक्ती में लीन है और शव्द उनके मुख से निकल रहे है “आप ही सर्वश्रेष्ठ हो मुझे तो आपके अलावा और कोई दिखता ही नहीं” प्रभु भक्ती में लीन मीरा बाई वृन्दावन गयी और वहा पर वह संत जीवा स्वामी से मिलना चाहती थी लेकिन जीवास्वामी स्त्रियों से मिलते नहीं थे तो मीराबाई बोली “में तो समझती थी यहा पर सभी गोपियाँ ही गोपियाँ रहती है पर मुझे मालुम पड़ा कि गोपीओं के अलाबा भी कोई और है”
इस वाक्य ने जीवास्वामी के हृदय को परिवर्तित कर दिया। मुनि श्री ने कहा कि कही बार हम लोग “शब्दों को पकड़कर बैठ जाते है और अर्थ का अनर्थ कर बैठते है” पहले के जमाने में शास्त्रार्थ हुआ करते थे शास्त्रार्थ करने वाले अनेक धर्मों का अध्यन भी करते थे तभी वह अपनी बात को तर्क सहित रख पाते थे। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन अनेकांत मूलक दर्शन है, जो वस्तु के उत्पाद, व्यय, और धौर्य स्वरुप को प्रदर्शित करती है, यदि हमारी दृष्टी अनेकांत मय है तो किसी प्रकार का विवाद नहीं होगा और हमारी दृष्टि समग्र कहलाएगी।
उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि एक व्यक्ती अपने बेटे का पिता है तथा उसका बेटा पिता भी है उसके अपने बेटे का यही अनेकांत दृष्टि कहलाती है। “ही” से “भी” की ओर चलो” उदाहरण के तौर पर में “ही” सत्य हूं के स्थान पर “वह “भी” सत्य है” यही “अनेकांत” है। इसलिये शब्दों को नहीं शब्दों के अर्थ को पकड़िये। समग्र दृष्टि से ही वस्तु के स्वरूप को पकड़ा जा सकता है, मैं ही सत्य हूं मैं एकांत है और वही झगड़ा है जबकि अनेकांत में वह भी सत्य है यह अनेकांत है जिसमें समाधान है। यही समग्र दृष्टि है जिसमें सभी समस्याओं का समाधान है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
