तप उत्साह, पवित्रता और विशुद्धि के साथ करो तथा यथा शक्ति के साथ करो अपनी शक्ति का दुरूपयोग नहीं करना है। प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
इच्छा निरोधः तपः” तपस्या का उद्देश्य भौतिक उपलब्धि के लिये नहीं,तपस्या का उद्देश्य विषयों से विरक्ति,तथा आंतरिक विशुद्धि के साथ कर्मो का क्षय कर परमात्म तत्व का होना चाहिये”उपरोक्त उदगार संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने “मोहताभवन” रैसकोर्स रोड़ पर पर्युषण पर्व के सातवे दिवस उत्तम “तप” धर्म पर व्यक्त किये।
उन्होंने चार बातें बताते हुये कहा कि “तप” क्या?तप क्यों?तप कब?तथा तप कैसे?उन्होंने कहा कि मात्र बड़े बड़े तपस्वी ही तप कर सकते हे यह जरुरी नहीं,यह शक्ति तो आप सभी के पास है इस शिविर में कई ऐसे युवक है,जो कभी उपवास की छोड़ो
एकासन करने में भी घबराते थे वही युवक एवं बुजुर्ग सातवा निर्जला उपवास कर रहे है, सोलह तथा बत्तीस उपवास कर रहे है, आप लोग भी एकासन कर रहे है कोई रस का परित्याग कर रहा है यह भी कोई साधारण बात नहीं है? आखिर यह शक्ति भी आपके पास कहा से आई? मुनि श्री ने कहा उपवास, एकासन रस परित्याग यह सभी बाहरी तप के ही रुप है और हमें तो आप सभी तपस्वी ही नजर आ रहे है उन्होंने आशीर्वाद देते हुये कहा तप उत्साह, पवित्रता और विशुद्धि के साथ करो तथा यथा शक्ती के साथ करो अपनी शक्ती का दुरूपयोग नहीं करना है। उन्होंने कहा कि यह शारिरिक तप है,दूसरा है मानसिक तप तथा तीसरा है। बाचनिक तप उन्होंने कहा कि आप सभी अपनी लोग अपनी सुख सुविधाओं को छोड़कर प्रातः5 बजे से रात्री 8 बजे तक यंहा पर बैठे हो पूजा पाठ कर रहे हो यह भी एक तपस्या है,लेकिन यह तपस्या असली तपस्या नहीं असली तपस्या तो “इच्छा निरोधः तपः अर्थात अंदर से सभी “इच्छाओं के निरोध का नाम तप है”
मानसिक तप की चर्चा करते हुये कहा कि यदि कोई आपसे






कितनी भी कठोर बात कह दे आप उसका प्रतिकार मत करना किसी ने कुछ कहा तो हंसकर टाल दैना, कभी किसी से कड़वे वचन मत बोलना यदि इतना संयम आपके अंदर आ गया तो यह भी एक तपस्या है, तीसरा तप मानसिक स्तर का है कैसी भी परिस्थिति हो अपने “मन” को प्रसन्न बनाये रखना सुख -दुःख में, हानि लाभ में, मान -अपमान में,संयोग- वियोग में अपनी प्रसन्नता को बनाये रखना भी एक तपस्या है,
मुनि श्री ने कहा समस्याओं के कारण आकुलता नहीं,आकुलता ही एक समस्या है “प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने आपको प्रसन्न बनाये रखना “मानसिक तप” है,मुनि श्री ने कहा कि
“तप” चेतना की विशुद्धि के लिये किया जाता है,उन्होंने आचार्य शुभ चंद्र और भृतहरि की कथा सुनाते हुये कहा कि दोनों राजकुमार थे उनको मारने का षड्यंत्र रचा गया तो वह वैराग्य से प्रेरित होकर तपस्या करने निकल पड़े 12 वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात भृतहरी ने कठोर तापसी का रूप धारण कर एक ऐसा स्वर्ण रसायन तैयार कर लिया जिसे किसी भी पदार्थ पर डाल दो तो वह स्वर्ण रुप परिवर्तित हो जाता था उधर छोटा भाई शुभचंद्र ने दिगंबर रुप धारण कर अपनी आत्मा की उपासना में लीन हो गये। जब भृतहरी को अपने भाई का स्मरण हुआ और वह अपने भाई आचार्य शुभचंद्र से मिलने पहुंचे और उन्होंने भाई को स्वर्ण रसायन दिया तो शुभ चंद्र महाराज ने उसे वंही उड़ेल दिया भृतहरी एक दम भौचक्के रह गये और कहा कि मेरी 12 वर्ष की तपस्या को मिट्टी में मिला दिया तो आचार्य शुभचंद्र बोले कि हमने 12 वर्ष की तपस्या को मिट्टी में नहीं मिलाया हम दोनों राज्य छोड़कर सुख शांति के लिये निकले थे इधर मेंने तो आत्म ध्यान किया लेकिन तुमने 12 वर्ष बरबाद कर दिये तुम जिस स्वर्ण की बात कर रहे हो तो देखो और शुभ चंद्र महाराज जिस पत्थर की शिला पर बैठे थे वहा पर अपने मस्तक से पसीने की बूंद को छिड़का तो वह पूरी शिला ही स्वर्ण की हो गयी यह देख भृतहरी भौचक्का रह गया।और उसने भी तुरंत दिगंबर दीक्षा ले ली।
धर्म प्रभावना समिती के अध्यक्ष अशोक डोसी,महोत्सव अध्यक्ष नवीन गोधा महामंत्री हर्ष जैन आनंद गोधा ने अतिथियों का सम्मान किया प्रवक्ता अविनाश जैन “विद्यावाणी” तथा मीडिया प्रभारी राहुल जैन स्पोर्ट्स से प्राप्त जानकारी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
