इच्छाओं का निरोध तप है सभी कार्य विनयपूर्वक श्रद्धा भक्ति से करेआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

इच्छाओं का निरोध तप है सभी कार्य विनयपूर्वक श्रद्धा भक्ति से करेआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

पारसोला    

पंचम पट्टाघीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज 56 वे वर्षायोग हेतु पारसोला में विराजित है। आचार्य श्री संघ सानिध्य में मन्दिरों में धार्मिक अनुष्ठान हो रहे हैं। तपस्वी भी अपनी शक्ति अनुसार व्रत उपवास कर रहे हैं तप अर्थात तपना होता है । तप सभी कर रहे हैं तप तभी सार्थक होगा जब अभिषेक , पूजन, दर्शन, कर्तव्य विनय पूर्वक सजगता के साथ करेंगे ।ग्रहस्थो  का मन स्थिर होना जरूरी है ,तभी  कर्मों का नाश होगा अन्यथा कर्मों का आश्रव होगा, कर्मों का आश्रव होने से तप नहीं होता है इच्छा का निरोध  करना तप है ।इच्छाएं अनेक होती है तप क्यों करना चाहिए इस पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सरल शब्दों में बताते हैं कि कर्मों के क्षय के लिए तप किया जाता है आप अनेक कर्म संचित कर रहे हैं इनका आत्मा पर बोझ बना हुआ है ।प्रभु की आराधना,  पूजा अभिषेक ,द्वारा परिणाम में  स्थिरता लाकर कर्मों की निर्जरा और पुण्य का आश्रव किया जाता है ।गृहस्थ अवस्था में आपका कर्म संचय होता है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उक्त देशना पारसोला में उत्तम तप धर्म पर प्रकट की।आचार्य श्री ने धार्मिक पर्वों  पर पूजन अभिषेक से अपनी आत्मा को खोजने का प्रयास करें। कर्मों के पहाड़ को तप रत्नत्रय धर्म रूपी बुलडोजर से हटाया जाता है। आचार्य श्री ने अपने धर्म देशना में बताया कि कर्मों के कितने प्रकार होते हैं और तप स्थूल रूप से दो प्रकार के होते हैं अंतरंग तप और बाह्य तप इसके अनेक भेद है जिसकी विवेचना सरल शब्दों में आचार्य श्री ने की।आत्मा आत्मदेव है इसकी विनय करना जरूरी है, समझना जरूरी है ।धर्म कार्य अनुष्ठान में आत्मा का परिचय होता है उत्तम क्षमा से दशलक्षण धर्म प्रारंभ हुए हैं सभी पर्व, सभी धर्म आत्मा के गुण हैं संसार परिभ्रमण से छुटकारा पाने की राह पर्वों से मिलती है ।इच्छाओं को रोकना ही तप है। तप में कष्ट होता है, तप में बंधन दिखाई देता है । ब्रह्मचारी गज्जू भैया एवं राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि तीर्थंकरों की देशना है,  तप की राह में इच्छाओं को रोकना अति  आवश्यक है ।सौभाग्यशाली हैं हम  कर्मभूमि के मनुष्य, जिन्हें तप करने का अवसर प्राप्त हुआ है, जिस तप को करने के लिए सर्वार्थ सिद्धि के देवता भी तरसते हैं कि हमें मनुष्य जन्म प्राप्त हो और हम भी तप करके कर्मों का नाश कर सके। तप एक प्रकार की अग्नि है जो वस्तु को शुद्ध करने का कार्य करती है तप मनुष्यों के लिए चिंतामणि है क्योंकि जैसे चिंतामणि चिन्हित वस्तुओं को देता है ,वैसे ही तप मनोवांछित वस्तुओं का प्रदाता है तप कामधेनु है। सभी जानते हैं कि दूध में घी होता है, लेकिन मात्र दूध में हाथ डालने से घी प्राप्त नहीं होता है ,उसकी भी एक विधि है, प्रक्रिया है कि दूध को गर्म करने के बाद उसमें जामन दिया जाता है, प्रातः काल उसे दही को जब मथनी  से मथा जाता है तो ,उसे दही में से सारभूत मक्खन निकलता है, और उसकी उसको अग्नि में तपाया जाता है तब घी की प्राप्ति होती है। हर वस्तु की एक प्रक्रिया है ठीक इसी प्रकार कर्म से बंधी हुई हमारी आत्मा मालीनता को प्राप्त हो रही है अशुद्ध अवस्था को प्राप्त होकर संसार में परिभ्रमण कर भटक रही है। उसे शुद्ध करने के लिए तप रूपी अग्नि की आवश्यकता है, तप का अभिप्राय है पृथक और प्रकट करना ।अपने तेज में आगत पदार्थ को तपाकर  उसके अशुद्ध तत्व को, खोट को पृथक करना और ,शुद्ध तत्व स्वरूप को प्रकट करना।  तप एक अद्भुत शक्ति है।संयम सहित अल्प तप भी महाफल युक्त होता है । तप आत्मिता के साथ होना चाहिए तप करने से इंसान असली रूप में मजबूत होता है ,अपनी शक्ति को नहीं छुपाते हुए मोक्ष मार्ग के अनुकूल शरीर को कष्ट देना अर्थात  कर्म क्षय के स्वयं को तपाना , तप है। मुनि और गृहस्थ दोनों को अपनी शक्ति को नहीं छुपा कर शक्ति के अनुसार तप करके कर्मों की निर्जरा करना चाहिए  प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने अपने 40 वर्ष के संयमी जीवन में 9938 उपवास किए थे। अनेकों उपसर्ग समता भाव से शान्ति के सागर बन कर किये।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

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