वो पाप मत करना जिसे कभी माँ बाप से छुपाना पड़े : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ परिसर में पूज्य निर्यापक श्रमण सुधा सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन देते हुए कहा की सबसे बडा छलकपट होता है व्यक्ति दूसरी की छिपी हुई वस्तु को जानने का प्रयास करता है, ये पहली मायाचारी है। जब जब तुम्हें कोई दूसरे के संबंध में अवगुण जानने की बात आवे, नियम से आपके अंदर मायाचारी जागेगी क्योंकि वह अपने दुर्गुणों को छुपाए बैठा है। हर व्यक्ति का नेचर है कि वह अपने अवगुणों को, अपनी कमियों को छिपाता है। आज बहुत विरले लोग है जो अपनी कमी को कभी उजागर कर देते हैं, इतना सरल दुनिया में कौन है? वह है जिस व्यक्ति के अंदर आर्जव धर्म प्रवेश कर जाएगा। किसी ने कहा आर्जव धर्म कैसा होता है? उसने कहा आर्जव धर्म मुनि महाराज जैसा होता है। प्रकृति ने बालक बनाकर भेजा था, वह जवान होने पर भी बालकवत रहते है इसी का नाम है-वीतराग मुद्रा।
दो कारण से व्यक्ति कपड़े पहनता है- एक तो स्वयं में विकार भाव की अनुभूति होती है तब व्यक्ति वस्त्र पहना है यह दूसरे को तुम्हें देखकर विकार भाव आता है तब कपड़े पहनना पड़ते है लोकलाज के कारण। साधु को कभी अपनी उम्र की अनुभूति नहीं होती, साधु कभी जवान नही रहता और जो जवान होता है वह कभी साधु रह नहीं सकता। साधु कभी बूढ़ा नहीं होता, जिस दिन बूढ़े की अनुभूति हो जाए, साधुता पलेगी ही नही।

जिसकी आँख में बालक की तरह मात्र माँ को खोजने की शक्ति आ जाती है वही आर्जव धर्म को समझ लेता है। साधु को कहा खबर आती है कि यहां महिलाएं हैं या पुरुष, सभी साधर्मी है, भेद ही खत्म हो जाता है। दिगंबर मुद्रा आर्जव धर्म का जीता जागता उदाहरण है, कोई छुपाव नही, सबकुछ खुली किताब रखों। खड़े होकर आहार लेना आर्जव धर्म का, सहजता, सरलता,
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निर्विकारता का प्रतीक है।



तुम अपने से छोटे में कौन सी बुराई नहीं चाहते हो कि मेरी बेटे में यह बुराई नहीं होना चाहिए, भारत के नागरिक में, आपकी जैन जाति में, आपके परिवार में, आपकी बेटे में कौन सी बुराई नहीं होना चाहिए? वह तुम्हें नोट करना है और वह बुराई तुम्हारे में है, उसे तुम छुपाना चाहोगे या प्रकट करना चाहोगे? गर उसको तुम उजागर करना चाहोगे, बस तुम्हारी जिंदगी में आर्जव धर्म स्वीकार हो गया। वह अपने अवगुणों को उघाड़ता है, दुनिया के सामने में बुरा आदमी हूँ, मैं गंदा आदमी हूँ, लोग बुरा कहेंगे, पापी कहेंगे तो कहने दो। लोग मुझसे घृणा करेंगे, करना चाहिए, मैं घृणा का पात्र हूँ। तुम बुरे हो तो बुरा सुनने की आदत डालों।
संसार के राग-द्वेष की कषायें कभी मंदिर की जाजम पर मत निपटाना, धार्मिक कार्यों में, धार्मिक महोत्सवों में मत निपटाना, यह जघन्यतम अपराध कहलाता है। खुले चौराहे पर आ जाओ कि मैंने पाप किया है, मुझे सजा मिलना चाहिए, क्या इतनी हिम्मत है? पाप करना बुरा नहीं है, पाप को छुपाना बुरा है। गलती करने के बाद गलती को छुपाना ये सबसे बड़ा अधर्म है।
कोई भी पाप हो जाये, जिसको तुमने बुरा माना है, अपने गार्जियन से कभी मत छुपाना, गार्जियन से झूठ मत बोलना। माँ बाप तुम्हारे पहले गार्जियन है, वहाँ से शुरू करो आर्जव धर्म? एक नियम लो सभी कि मेरी जिंदगी में कितना भी बड़ा पाप हो जायें, मैं अपनी माँ-बाप से नहीं छुपाऊंगा। दुनिया से इसलिए छुपाया कि वह घृणा करेंगे लेकिन माँ-बाप से मत छुपाओ, वह तुझसे घृणा नही, बचाने का प्रयास करेंगे। माँ-बाप के सामने सरल बन जाओ, सहज बन जाओ। वो पाप मत करना जिसे कभी माँ बाप से छुपाना पड़े, बस इतना ही पाप तुमने छोड़ दिया तो आर्जव धर्म तुम्हें गले लगा कर कहेगा-कोई बात नही। माँ-बाप से बुराई छुपाना और डॉक्टर से बीमारी छुपाना ये तुम्हारे विनाश का लक्षण होता है।
भाई भाई की दृष्टि में डाकू, सास बहू की दृष्टि में डाकू, छुपा रहे है आज घर-घर की मायाचारी दूर हो जाये, बाकी धर्म की मायाचारी बाद में देखूँगा। घर में एक दूसरे के लिए कोई ताला नहीं लगना चाहिए, मन मे भी भाव नही आना चाहिए। जिसके लिए ताला लगाया जा रहा है उसको सोचना है और ताला लगाने वाले से कह रहा हूँ किसके लिए छूपा रहे हो, जो अपने परिवार से माँ-बाप से छुपाता है, वह नियम से मरकर तिर्यंच गति ही जाएगा। जिन जिनने ने माँ-बाप से छुपाकर के ससुराल में माल रखा है, वह काला धन वापिस भारतीय बैंक में आना चाहिए। भारतीय बैंक है माँ-बाप। जो अच्छे माँ बाप है उनकी बात कर रहा हूँ। भाई के हाथ से मरो तो मर जाना श्रेष्ठ है लेकिन मायाचारी करना श्रेष्ठ नही।
अजय जैन लांबरदार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



