काबिल लोग न तो डरते हैं,ना किसी से दबते हैं,और ना किसी को दबाते हैं अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज/
कुलचाराम हैदराबाद
काबिल लोग न तो डरते हैं,ना किसी से दबते हैं,और ना किसी को दबाते हैं.
अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा की जवाब देना तो उन्हें भी खूब अच्छे से आता है, पर कीचड़ में पत्थर कौन मारे-? यही सोचकर चुप रह जाते हैं। उन्होंने कहा की माना कि संसार कीचड़ है, लेकिन ध्यान रहे — कमल कीचड़ में ही खिलता है।

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर इसी कीचड़ में खिले। आचार्य कुन्दकुन्द, जिनसेन स्वामी भी इसी कीचड़ में खिले। लेकिन ये कीचड़ में कीडे़ की तरह नहीं जीये बल्कि कीचड़ में कमल की तरह निर्लिप्त होकर जीये।
महाराज श्री ने भारतीय संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति शुरू से इस बात पर पक्षधर रही है कि जो लोग अपनी ऊर्जा को ध्यान, समाधि, साधना में नहीं लगा सकते, ऊर्जा का ऊर्ध्वारोहण नहीं कर सकते, तो वे लोग गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर गृहस्थ धर्म का निर्वाह करे।
काम में भी राम की तलाश जारी रखें।* कीचड़ में कमल की साधना करें।कमल का कीचड़ में रहना और मनुष्य का संसार में रहना बुरा नहीं है। बुराई तो ये है कि कीचड़, कमल पर चढ़ आये और संसार हृदय में समा जाये। तुम कमल हो, तुम्हारा परिवार कमल की पंखुडियाँ है, तथा संसार कीचड़ है।
कीचड़ में कमल की भांति जी सकें तो गृहस्थ जीवन भी किसी तपोवन से कम महत्वपूर्ण नहीं…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
