कबहुँ न निज घर आएँ । सुख को अपने भीतर ढूंढे बाहर ढूंढने वाले को दुख ही दुख मिलता है। प्रज्ञासागर महाराज

धर्म

कबहुँ न निज घर आएँ । सुख को अपने भीतर ढूंढे बाहर ढूंढने वाले को दुख ही दुख मिलता है। प्रज्ञासागर महाराज
झालरापाटन
तपोंभूमि प्रणेता आचार्य श्री 108 प्रज्ञा सागर महाराज ने कहा कि नासमझ कहें जाने वाले पशु पक्षी शाम होते ही अपने घर लौट आते हैलेकिन जिंदगी की शाम हो जाने के बाद भी समझदार कहा जाने वाला इंसान अपने घर नहीं लौटता।

 

महाराज श्री ने कहा जिसे आप अपना घर कह रहे है वह आपका
घर नहीं है। आपका घर तो आपकी आत्मा है। महाराज श्री ने पंडित दौलतराम जी पंक्तियों को बोलते हुए कहा कि इसलिए तो पण्डित दौलतराम जी ने कहा- पर घर फिरत बहुत दिन बीते नाम अनेक धराये हम तो कबहुँ न


निज घर आएँ । सुख को अपने भीतर ढूंढे बाहर ढूंढने वाले को दुख ही दुख मिलता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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