गुरु चरणों मे बैठो यही संसार से तिराते हैं:- संजय जैन बड़जात्या कामां
गुरु की महिमा का गुणगान शब्दों के माध्यम से कर पाना बड़ा ही कठिन प्रतीत होता है। शब्दकोश में यदि शब्दों को खंगाले और मन से उन शब्दों की तुलना करें, तो शब्दकोश भी गुरु गुणगान में कम नजर आता है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है *गुरु की महिमा वरणी ना जाए गुरु नाम जपो मन वच काय* आज का यह पावन दिवस गुरु वंदना के साथ साथ उनके प्रति, उनके द्वारा प्रदत्त उपकारों के लिए कृतज्ञता जाहिर करने का दिवस है।
वैसे तो गुरु को किसी भी रूप में देखा जा सकता है। सीधी सी परिभाषा दी गई है कि जो आपको कुछ सिखाता या उनसे कुछ सीखते है वही गुरु होता है।
आइए हम गुरु को तीन भागों में विभाजित करने का प्रयास करते हैं। प्रथम गुरु मां को कहा गया है जो बच्चे का लालन-पालन कर उसका समाज से परिचय कराती है और बड़ा होने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। द्वितीय गुरु अलौकिक गुरु जिन्हें शिक्षक के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जैसे अकादमिक,संस्थागत ,विषयगत या अन्य प्रकार से जीवनोपार्जन की क्रियाओ को सिखाने वाले को गुरु कहते हैं। तृतीय लौकिक एवं आध्यात्मिक गुरु जो वास्तविक गुरु होते हैं जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। हमारा हाथ थाम कर हमें नीचे गिरने से रोक कर, ऊंचाई की ओर अग्रसर करते हैं। जो हमारा हर समय उत्थान, विकास,उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यूं कहें कि यही सच्चे गुरु होते हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जीवन में यदि गुरु सही मिल जाए तो फिर जीवन की दिशा और दशा में परिवर्तन होना लाजमी है।
यकायक जीवन एक नई राह पर चल पड़ता है। इस संसार चक्र से मुक्ति पाने हेतु वैराग्य के पथ को अंगीकार करने के लिए आगे बढ़ने लगता है। गुरुओं के प्रति सच्ची श्रद्धा, उन पर अटल विश्वास व आस्था का होना बहुत जरूरी है नही तो कल्याण का मार्ग किसी भी सूरत में प्रशस्त नही हो सकता है। सरल शब्दों में कहूँ तो गुरु चरणों मे बैठो यही संसार से तिराते हैं।

*गुरुओं की वाणी का जो रसपान करते हैं*
*वही वास्तव में जीवन के सोपान चढ़ते हैं*
इसी भावना के साथ आप सबको गुरु पूर्णिमा की एक बार पुनः हार्दिक हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
