बालविदुषी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी के अवतरण दिवस पर विनयांजली
त्रिलोक कल्याणी जगत पूज्या सर्वाधिक दीक्षा प्रदात्री गणिनी आर्यिका105 विशुद्धमति माताजी की परम शिष्या समता साधिका त्याग तप की प्रतिमूर्ति बालविदुषी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञ मति माताजी का आज हम अवतरण दिवस बना रहे है।
उनके तप, त्याग, ज्ञान, संयम की जितनी महिमा गाए जाए कम होगीआज ऐसी बाल विदुषी आर्यिका को पाकर आज जैन जगत ही नहीं सम्पूर्ण जगत गोरवान्वित है ।

पूज्य माताजी यथा नाम तथा गुण को सार्थक कर रही है। जैन धर्म की ध्वजा को जयंवत किया हैं। उनके द्वारा लिखित साहित्य सृजन व्यक्ति के जीवन को उन्नत कर रहा है। और प्रभु एवम गुरु के प्रति अनेक भक्तिमय भजनों का सृजन भी किया जो हमें सीधा प्रभु और गुरु के समीप ले जाता है।
इनका जन्म 20-7-1969 एटा उत्तर प्रदेश में स्वर्गीय श्री जिनेंद्र प्रकाश जैन एवं माता श्रीमती रेशम देवी जैन की बगिया में हुआ इनकी माताजी ने गणिनी गुरु मां विशुद्धमति माताजी से छुल्लिका दीक्षा को ग्रहण किया जो छुल्लिका 105 विवर्धमति माताजी के रूप में रही । लालन पालन में इनका जन्म नाम – कुमारी आभा जैन रखा गया जिन्होंने आगे चलकर इस नाम को भी सार्थक किया और जैन धर्म की आभा को पुलकित किया लौकिक शिक्षा – B.A तक पूर्ण की।
इनका लक्ष्य संसार से विरक्ति लेने की और रहा। और ये एक कदम आगे बढ़ाते हुए गणिनी गुरु मां 105 आर्यिका 105 विशुद्धमति माता जी के चरणों में चली गई और उन्होंने उनके चरणों में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेने के लिए निवेदन किया और सन – 1985 एटा मे गणिनी आर्यिका विशुद्धमति माताजी से लिया। वे आगे बढती गई पंचमप्रतिमा – माह सुदी दोज 1993 राजस्थान गणिनी माताजी से सप्तम प्रतिमा – 26-1-2001 शिकोहाबाद में लिया।
अब वह समय आ गया जब नारी का सर्वोच्च पद आर्यिका दीक्षा का और गणिनी माताजी से आर्यिका दीक्षा – 9-10-2008 कोटा राजस्थान विजयादशमी शिक्षा दीक्षा गुरु माँ – गणिनी आर्यिका 105 विशुद्धमति माताजी से ली
आपके द्वार भजनों की संकलित एल्बम
पूज्य माताजी ने अनेक भजन को लिखा जिनकी कही एल्बम है- (1) विशुद्ध विनयांजलि (2) रत्नत्रय भक्ति दीपक 24तीर्थंकर प्रभु चालीसा (3) गुरु माँ विशुद्ध की ओडेगे चंदरिया।
रचित साहित्य
इनके द्वारा कई साहित्य का लेखन किया गया
(1) शनिगृह निवारक तीर्थंकर मुनिसुव्रत विधान (2) आदिनाथ विधान (3) रत्नत्रय भक्ति दीपक तीर्थंकर तीर्थंकर प्रभु के चालीसा (4) श्री पार्श्वनाथ विधान (5) पूजाजली (6) आराधना की साधना (7) आई दिवाली करे पूजन) (8) विशुद्धभक्ति गीता जिनसहस्त्रनाम विधान जो अपने आप में इनके ज्ञान तप की महिमा को बताता है।
इस पुनीत अवसर हम यही कामना करते है आपका रत्नत्रय इसी तरह फलीभूत होता रहे आप दीर्घायु हो और सदा संयम पद पर और अग्रसर हो
शत शत वन्दामी सहित पदमकुमार सुलोचना अभिषेक एवम समस्त लुहाडिया परिवार रामगंजमंडी
