आचार्य भगवन् विद्यासागर का जन्म समस्त मानवजाति और सभी जीवों के उद्धार के लिये हुआ था युगों युगों तक उनका नाम जीवंत रहेगा…मुनि श्री
विदिशा :
आचार्य भगवन विद्यासागरजी महाराज का जन्म हम सभी मुनिराजों के उद्धार के लिये हुआ था मुनि बनना यह उनका पुण्य हो सकता है,लेकिन आचार्य बनने में हम सभी का पुण्य था यदि आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने विद्याधर को मुनिदीक्षा देकर आचार्य पद पर आसीन न किया होता तो हम लोगों का उद्धार कैसे होता
उपरोक्त उदगार संयुक्त रुप से मुनि श्री निष्पक्षसागर, मुनि श्री निष्प्रह सागर,मुनि श्री निष्कंप सागर,मुनि श्री निष्काम सागर जी महाराज ने आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महामुनिराज के 57 वे दीक्षादिवस पर शीतलधाम में प्रातःकालीन धर्म सभा में कही

कार्यक्रम की शुरुआत गुरुदेव के चित्र समक्ष दीप प्रज्वलन और मंगलाचरण से हुई तत्पश्चात विदिशा नगर के सभी जिनालयों से आए महिलामंडलों ने आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज पूजन संपन्न की।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रत्येक पूजन के छंद पर महिलामंडल सजाए हुये पूजन थाल के साथ क्रमशः जल चंदन अक्षत पुष्प नैवैद्य दीप धूप फल तथा अर्घ समर्पण किया। इस अवसर पर शीतल विहार न्यास, मुनिसेवक संघ समग्रपाठशाला समिति, सकल दि. जैन समाज ने समर्पित भाव के साथ समस्त समाज ने गुरुदेव को याद करते हुये महाअर्घ समर्पित किया।

श्रद्धालुओं ने चारों मुनिराजों का पादप्रक्षालन एवम शास्त्र भेंट कर पुण्यलाभ अर्जित किया।प्रातःकालीन बेला में भगवान आदिनाथ बर्रो बाले बाबा का अभिषेक एवं शांतिधारा कर पुण्यलाभ अर्जित किया। मुनि श्री ने कहा ऐसा लगता है कि “कुन्डलपुर के बड़े बाबा की छवि में आचार्य श्री समाहित होकर हम सभी का कल्याण करने के लिये ही इस धरती पर आए थे,आचार्य भगवन् तो निश्चित ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर चुके है।
उन्होंने न सिर्फ अपना ही उद्धार नहीं किया बल्कि सभी जीवों का उद्धार करने के लिये ही इस धरती पर आए यह आचार्य गुरूदेव की ही परिकल्पना थी, गौवंश को बचाने के लिये सामने आए तथा समस्त भारत में एक सौ पचास गौशालाओंं के माध्यम से दयोदय महासंघ के माध्यम से लाखों पशुओं को जीवनदान दिया तथा गांव गांव में तथा जेल में रह रहे उपेक्षित कैदियों को रोजगार प्रदान करते हुये हथकरघा केन्द्र खुलवाए उनके द्वारा उत्पादित अहिंसक वस्त्रों के साथ अभिषेक एवं आहार में प्राथमिकता दी, आज संपूर्ण भारत की जेल में उच्चकोटि के वस्त्र निर्माण का कार्य ब्रहम्चारी भाईओं तथा बहनों के निर्देशन में प्रशिक्षित कारीगरों द्वारा किया जा रहा है।

तीसरा कार्य था बेटियो को सुसंस्कार के साथ उच्चशिक्षा मिले।गुरुदेव के आशीर्वाद से प्रतिभास्थलीयो का निर्माण आर्यिका संघ और कुशल उच्च शिक्षित ब्रहम्चारी बहनों ने योगदान देकर भारतीय संस्कृति की रक्षा की।आचार्य श्री कहते थे कि एक बालिका यदि सुस़स्कारित होगी तो वह आने वाली पीढ़ी को सुसंस्कारित करेगी, उन्होंने भारतीय शिल्पकला तथा शिल्पकार दोनो को महत्व देते हुये हजारों हजार वर्षों तक भारतीय संस्कृति के साथ साथ जैन संस्कृति की रक्षा करते हुये उच्चस्तरीय जिनमंदिरों का निर्माण कराया। स्थान स्थान पर पाषाण के नये भव्य तीर्थ आज उनकी गौरवगाथा को कह रहे है।
उन्हीं तीर्थों में विदिशा नगर की शान भगवान शीतलनाथ स्वामी के चार कल्याणकों से सुशोभित यह भूमी पर समवसरण मंदिर जो कि 2008 में आचार्य भगवन के चरणों से उद्धार हुआ था आज भव्य तथा ऐतिहासिक समवसरण मंदिर का रूप धारण कर चुका है,आदिनाथ स्वामी का पीले पाषाण का जिनालय तथा सहस्त्रकूट जिनालय निर्माण के साथ साथ पूर्णतः की ओर है समस्त भारत में कुंडलपुर महातीर्थ के साथ नेमावर, रामटेक,नागपुर,सागर,जबलपुर,भोपाल,बीनाबारह,अमरकंटक,खजुराहो,डोंगरगढ़, आदि कही क्षेत्रों में विशाल मंदिरों के निर्माण कार्य चल रहे है इससे शिल्पकला तो विकसित हुई ही है साथ ही उन शिल्पकारों को भी अपनी कला दिखाने का अवसर एवं रोजगार भी मिला है।
इसके साथ ही आचार्य श्री ने भारतीय चिकित्सा पद्धति को भी प्रोत्साहित करते हुये “भाग्योदय” सागर,एवं “पूर्णायू” जबलपुर जैसे चिकित्सा महाविद्यालय एवं आधुनिक चिकित्सा के साथ संल्गन अस्पतालों का निर्माण कराकर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान केन्द्र स्थापित किये जिससे भारतीय चिकित्सा प्रोत्साहित हुई। साथ ही साथ संपूर्ण मानवजाति के स्वास्थ्य के लिये यह कार्य किया।आज समूची मानवजाति उनको याद करती है। (अविनाश जैन विदिशा से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
