कुंडलपुर पंचकल्याण महामहोत्सवके पावन अवसर पर प्रस्तुत है हमारी यह रचना सादर—-
इस युग के महावीर आचार्य भगवन विद्यासागर महा मुनिराज ससंघ का (१३० मुनिराज)दि.28.11.18 को नव दीक्षित मुनिराजो सहित परिचय हमने अपनी इस रचना मे पिरोने का प्रयास किया है सादर प्रस्तुत है……
गुरु वंदन
हमारी पुस्तक आद्याक्षरांजलि से
दोहा
गुरु चरणों विन रे मनुज,
सारा जग वेकार।
चारों गति भटकत फिरे,
अब तो करो विचार।।
संत शिरोमणि जगत मे
विद्यासागर संत।
वीर श्रमण साधु महां
गुरुवर श्रेष्ट महंत।।
महाकवि महासंत जिन,
मुनि आचार्य प्रवर।
इस युग के अतिवीर तुम,
श्रमणाचार शिखर ।।
ज्ञानी ध्यानी शिष्य लख,
अचरज मे संसार।
मोक्ष पंथ के पथिक मुनि,
होंगे भव से पार।।
ऐसे श्री गुरु चरण मे,
अष्ट द्रव्य कर अर्पित।
मुनि नाम की लघु कृति
चरणन करुँ समर्पित।।
हमारी पुस्तक आद्याक्षरांजलि से
दोहा
गुरु चरणों विन रे मनुज,
सारा जग वेकार।
चारों गति भटकत फिरे,
अब तो करो विचार।।
संत शिरोमणि जगत मे
विद्यासागर संत।
वीर श्रमण साधु महां
गुरुवर श्रेष्ट महंत।।
महाकवि महासंत जिन,
मुनि आचार्य प्रवर।
इस युग के अतिवीर तुम,
श्रमणाचार शिखर ।।
ज्ञानी ध्यानी शिष्य लख,
अचरज मे संसार।
मोक्ष पंथ के पथिक मुनि,
होंगे भव से पार।।
ऐसे श्री गुरु चरण मे,
अष्ट द्रव्य कर अर्पित।
मुनि नाम की लघु कृति
चरणन करुँ समर्पित।।
मुनि-नाम स्मरण
दया क्षमा समता धरो,
संयम गुप्ती रुप।
समय योग पा नियम से,
चेतन ओम स्वरुप।।
सरल स्वभाव सुधा ,
धर वैराग्य प्रमाण।
आर्जव मार्दव धर्म से,
अंत समाधि कल्याण।।
पवित्र पावन चिन्मय,
उत्तम सुख अक्षय।
प्रशांत रूप विनीत,
करें अपूर्व निर्णय।।
निर्वेग पाय चन्द्र प्रबुद्ध,
प्रवचन पुण्य प्रसाद।
अक्षय अभय प्रसस्त,
प्रयोग प्रणम्य जिन पाद।।
पुराण कथा जो नर पढ़ें,
उनका शुभ्र प्रभात।
वृषभादिक चौवीस जिन,
अंतर हृदय समात।।
ऋषभ अजित संभव,
अभिनंदन जिन नाथ।।
सुमति पद्म सुपार्श,
चन्द्र पुष्प मुनिनाथ।।
शीतल श्रेयाँस तीर्थेस जिन
जय वासुपूज्य विमलेश ।
अनंत धर्म अरु शांति जिन
कुंथु अरह मल्लि पद्मेश।।
मुनिसुव्रत नमि नेमि प्रभु,
जय पार्श्वनाथ जिन राय।
महावीर जिन शरण मे,
तीन लोक हरषाय।।
चौवीसों जिन नाम धर,
धन्य धन्य मुनिराज।
विद्यासागर कृपा सिन्धु,
भव सागर तिरजात।।
क्षीर धीर उपशम प्रशम,
आगम महा प्रवीण।
विराट शैल सम अचल,
वैराग्य पुनीत नवीन।।
अविचल विशद विशाल,
सौम्य धवल मुनिराज।
दुर्लभ अनुभव अतुलनीय
बनते बिगड़े काज।।
विनम्र भाव निष्काम,
तब आनंद अपार।
अगम्य सहज निस्वार्थ,
निर्दोष निर्लोभ ही सार।।
निष्पृह निश्चल निष्कम्प,
निष्पक्ष महा मुनिराज।
निर्मोह नीरोग निरापद,
निष्पंद निरापद काज।।
निरामय निराकुल निरुपम,
निरीह निर्भीक निस्सीम।
नीरज नीराग निकलंक,
निर्मद निसर्ग असीम।।
शीतल शाश्वत निसंग,
समरस संधान श्रमण।
ओमकार संस्कार तब,
करते अरि कर्म क्षपण।।
निर्ग्रंथ परम पद जो धरें
निर्भांति निरालस वो बनें
निराश्रव निराकार निश्चिंत
वो अष्ट कर्म तप कर हने
निर्माण सुपथ निशंक कर
अंजन बन गए निरंजन
आतम तब निर्लेप विमल
निज आत्म भाव अनुगुंजन
कवि-राजेन्द्र’अनेकांत’बालाघाट
आचार्य भगवन विद्यासागर* महामुनिराज द्वारा दीक्षित सभी (172) आर्यिका माता जी के नामों को कविता मे
परम पूज्य १०५आर्यिका माँ
नाम स्मरण
गुरु दृढ़ मन नित सत्य पर
मृदु ऋजु बन झुकजाय,।
तपोषधि गुण तब निरख
जिनमति निर्णय पाय।।
उज्जवल पावन गुण अनंत
प्रशान्त पूर्ण चित संग।
निर्मल शुभ्र विमल कुशल,
जब साधू मन बने निसंग।।
शुक्ल ध्यान मय साधना,
जब चिंतन शुद्ध विशुद्ध।
विलक्षण गुण जिन प्रगट,
तब बन जाते वो बुद्ध।।
वैराग्य भावना धारणा,
जीवन के दुर्लभ क्षण
तब ही आत्म प्रभावना
जब अंतर मन को पढ़
आदर्श अपूर्व अनुपम
तब ही दिव्य प्रभाव।।
अनुनय अनुग्रह जानिए
अपने सहज स्वभाव
अमूर्त अखण्ड अक्षय,
आलोकित निज भाव।
अविचल अतिशय अनर्घ,
अनुत्तर सुख तब पाय।।
🌻
अकलंक निकलंक कृपा ,
तबआगम सिद्धांत प्रवीण।
स्वाध्याय मुनिजन करें,
नित निज आनंद मे लीन।।
अनुभव विशद विपुल ,
विनम्र नम्र जब मन बने।
पुराण मुदित अनुगमन,
प्रसन्न चित्त तब ही करे।।
प्रशम संवेग भाव नित,
विनत मधुर चित बैठ।
अधिगम सहज स्वभाव,
अमंद गति निज पैठ।।
अतुल अभेद एकत्वभाव,
सूत्र सुनय सत् शोध।
सब जग से निर्वेग तब,
शास्वत समयसार प्रबोध।।
सकल संयम मुनि धरें,
सतर्क सरल चित अनुचरें।
सविनय शील सुशील मन,
शीतल श्वेत धवल करे।।
🌻
सिद्ध सुसिद्ध विशुद्ध सौम्य,
शैल समुन्नत सदय सत्यार्थ
शांत सुशांत उपशांत जन,
समिति पाल बन जाते परमार्थ
उन्नति मति ऊँकारमति,
कैवल्य अमूल्य निधी पाय।
अचिंत अलोल्य अनमोल,
निर्वाण परम पद पाय।।
शास्त्र सुधार होता नही,
जिन आज्ञा जिन तथ्य।
जाग्रत हो कर्तव्य समझ,
अनेकांत कुतर्क का पथ्य।।
साकार चैत्य परमार्थ लक्ष्य,
निर्वाण विदेह पुनीत पथ जान।
श्रुत भक्ति श्रद्धा विनय सहित,
मुनि जन करके बने महान।।
वात्सल्य भाव उदार तथा,
निर्मद निष्काम वही संतुष्ट।
पाप विरत संस्कार स्वस्थ ,
अचल मेरु सम वही उत्कृष्ट।।
संगत उचित उत्कर्ष तभी,
गंतव्य ध्येय आत्म विजित।
आराध्य आप्त गुरु गौतम,
सुमरण से उद्योत दलित।।
पृथ्वी सम उपशम ध्रुव भाव,
चेतन सतत बनाओ।
संवर स्वभाव अकम्प तब,
पहचान निकट निज आओ।।
असीम अगाध चिंतन मनन,
अविकार तभी पार संसार।
संयत मार्दव मंगल भाव धर,
समझो ये ही चारित्र सार।।
आगत कर्म विपाक अवाय,
पर ध्यान से सब चकचूर।
निसर्ग हुए जब पाप सब,
समझो तब ही मुक्ति अदूर।।
राजेन्द्र जैन’अनेकांत’
बालाघाट दि.18-02-2022
