आष्टा की समाज में गुरु भक्ति कूट -कूट कर भरी है – – मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज संयम के मार्ग पर चलने वाले का जीवन हीरा मय होगा — मुनिश्री निर्वेगसागर महाराज

धर्म

,आष्टा की समाज में गुरु भक्ति कूट -कूट कर भरी है – – मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज संयम के मार्ग पर चलने वाले का जीवन हीरा मय होगा — मुनिश्री निर्वेगसागर महाराज
आष्टा।

व्यक्ति को भक्त बनने का अहंकार नहीं करना चाहिए,अहंकार को समाप्त करने का प्रयास करें,आष्टा की समाज में गुरु भक्ति कूट -कूट कर भरी है। धर्म से जो आत्म शांति मिलती है वह दुनिया में कहीं नहीं मिलती है। पार्श्वनाथ भगवान पर दस भव तक भयंकर उपसर्ग आएं, उन्होंने कोई पाप नहीं किए थे, फिर आपके जीवन में दुःख आते हैं तो घबराना नहीं, दुःख का धैर्य पूर्वक सामना करें।धर्म करने से विपत्तियां टलेगी, मुश्किल व बिगड़े काम होंगे।हम अपनी कमी को स्वीकार नहीं करते, जिसके कारण जिंदगी में दुःख आता है। जो संयम की राह चलेगा उसका जीवन हीरा मय होगा। तपस्या से निश्चित जीवन में आनंद आता है। तप आने से रत्नत्रय में बढ़ोत्तरी होती हैं।

 

 

उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर शंका समाधान एवं सम्मेद शिखर जी में गुणायतन तीर्थ प्रणेता मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज एवं मुनिश्री निर्वेग सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। मुनिश्री के प्रवचन की जानकारी देते हुए समाज के नरेन्द्र गंगवाल ने बताया कि कार्यक्रम के प्रारंभ में संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज के चित्र का अनावरण पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष कैलाश परमार सहित संरक्षक आदि ने कर श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद लिया।

 

 

मुनिश्री निर्वेग सागर महाराज ने इस अवसर पर कहा कि आष्टा में गुरु की कृपा व आशीर्वाद से पहले चातुर्मास व पंचकल्याणक महोत्सव किया।आप लोगों को हर साल चातुर्मास मिल रहा है।आप लोगों ने श्रद्धा और आस्था से हमारे चातुर्मास में धर्म लाभ लिया था और आचार्य भगवंत विद्यासागर महाराज द्वारा रचित मूक माटी का पूरा अध्ययन कराया था। अपनी कमी सहज स्वीकार करें।हम अपनी कमी को स्वीकार नहीं करते जिसके कारण जिंदगी में दुःख आता है। जो संयम की राह चलेगा उसका जीवन हीरा मय होगा। तपस्या से निश्चित जीवन में आनंद आता है। व्यक्ति के जीवन में तप आने से रत्नत्रय में बढ़ोत्तरी होती है ।देव, शास्त्र एवं गुरु का सम्मान तो करते हैं,उसी के साथ घर में बड़े के प्रति विनय और छोटे के प्रति वात्सल्य भाव रखें।

 

 

 

 

विनय के अभाव में कोई महत्व नहीं।विनय बिना पुरुषार्थ बेकार है।जैसा हम देंगे वैसा ही मिलेगा।विनय मोक्ष का मार्ग है। बड़ों की बात कभी न काटे।आप लोगों को बिना मांगे सब-कुछ मिलता है।

मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि हम लोग बड़े भाग्यशाली हैं, जो हमें धर्म आराधना करने के साथ ही साधु समागम मिलता है।हम धार्मिक क्रियाओं का बड़ी तन्मयता से करते हैं। कुछ लोग कहते हैं धर्म करने से मिलता क्या है। में कहता हूं कि धर्म से जो मिलता है ,वह संसार में कहीं से भी नहीं मिलता है। सच्चे तरीके से धर्म करने पर इमोशन पर कंट्रोल करता है। धर्म से जीवन अवश्य बदलेगा।हमारा लक्ष्य बदलाव, दृष्टि परिवर्तन की होना चाहिए। धर्म करने से पुण्य लाभ, सद्गति की प्राप्ति यह कहते हैं। धर्म आत्म बोध के साथ करें। सच्चे, यथार्थ धर्मी के दर्शन आपमें करना चाहता हूं। चार दृष्टि पर ध्यान देने को कहा। मुनिश्री ने कहा परम्परागत भाव से धर्म व संस्कार करते आ रहे हैं। धर्म की क्रिया बुरी नहीं उद्देश्य बहुत सही है।धर्म करने से विपत्तियां टलेगी, मुश्किल व बिगड़े काम होंगे। हम परेशानी, कष्ट में धर्म की शरण में जाते है। धर्म करने वाले पर विपत्ति आने पर हम उससे दूर हो जाते हैं। धर्मी पर अधिक विपत्तियां आती है। पार्श्वनाथ भगवान पर दस भव तक भयंकर विपत्तियां आई, विपत्ति आने पर घबराएं नहीं। मुनिश्री ने कहा सोना कसोटी पर ही परखा जाता है। सती की परीक्षा ली जाती है। धर्म हमारे संकटों को टालता नहीं ,हमें संभालता है। विचलित नहीं होने का सामर्थ्य धर्म देता है। व्यक्ति मैं समझ सही होना चाहिए। धर्म करने पर पुण्य मिलेगा,पाप कटेगा यह सोच है उद्देश्य है। पुण्य दिखाई नहीं देता है।

 

पुण्य -पाप की सही समझ नहीं है आपको । पुण्य से लगाव,पाप से डर है।भाव को जगाओगे, तभी धर्म करने से पुण्य बढ़ेगा। ह्रदय में पुण्य कमाने के भाव जगाओं, तभी पुण्यमय बनोगे। बनिये हो सिर्फ कमाने की भाषा जानते हो। पाप काटने के लिए नहीं त्याग करने के लिए धर्म करें । धर्म करने का वास्तविक उद्देश्य मन को शुद्ध करने।जीवन के यथार्थ को पहचानने का प्रयास करें। अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत लोग धर्म का उपयोग कर रहे हैं। अपनी आत्मा को पहचान कर धर्म करें। अपनी चेतना को जगाएं। धर्म के मर्म को समझ कर धर्म धारण करें। अपने अंदर परिवर्तन का लक्ष्य, उद्देश्य रखें।

आष्टा में तीसरी बार आया हूं मुनिश्री

 

 

 


मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा आष्टा में तीसरी बार आया हूं और मंच पर आसीन निर्वेग सागर महाराज सहित हम तीनों महाराज तीन बार आष्टा आ गए हैं। आष्टा का नाम आस्था ही है । अंतरंग से जुड़े, सोने में सुहागा होगा। इनपुट आउटपुट का ध्यान आप रखते हैं उसे अंतरंग में देखने का प्रयास करें। आत्मा के कल्याण की भावना जगाएं।

संकलित जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *