*अन्तर्मना उवाच* (30 मई!)

धर्म

*अन्तर्मना उवाच* (30 मई!)

*मैं उसी का जिम्मेदार हूँ,*
*जो मैने कहा है..*
*उसका नहीं,*
*जो तुमने समझा है..!*

 

 

 

*तभी तो आज कल लाख रूपये वाले की पूछ ही क्या है?* महंगाई का जमाना है। महंगाई तेजी से बढ़ रही है और इस महंगाई के युग में लाख रूपये क्या मायने रखते हैं? *महंगाई दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ रही है।* इसलिए लाख से परिवार नहीं चल रहा है।

 

*अगर महंगाई में होता रहा*
*इस तरह चढ़ाव,*
*तो अखबार में छप जायेंगे*
*एक दिन ये भाव।*
*गेहूँ एक रूपया जोड़ी,*
*चावल चार रूपया कोड़ी।*
*दूध पाँच रूपया बून्द,*
*घी बीस रूपये में सूंघ।*

*अहो आश्चर्य!* आज सब चीजों के दाम बढ़ रहे हैं, सिर्फ *आदमी* सस्ता हो रहा है। *आदमी से उसकी जान, और भी सस्ती हो गई है।*

*आज के युग में सबसे सस्ता आदमी है। और आदमी की मार्केट वेल्यू कुछ भी नहीं है, उसे कोई भी नहीं पूछ रहा है…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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