आचार्य श्री अजीत सागर महाराज ने संयम का रक्षण और संवर्धन किया वर्धमान सागर महाराज

धर्म

आचार्य श्री अजीत सागर महाराज ने संयम का रक्षण और संवर्धन किया वर्धमान सागर महाराज
बांसवाड़ा
जो शिष्य गुरु से संयम प्राप्त कर दीक्षा लेते हैं, एक अक्षर का भी ज्ञान गुरु से प्राप्त करते हैं ऐसा कोई द्रव्य धन नही हे जिससे शिष्य गुरु के उपकार का भुगतान कर सके। आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज ने संयम का रक्षण और संवर्धन किया। गुरु के बिना गुणों की प्राप्ति नहीं होती है ज्ञान और संयम गुरु से प्राप्त होता है गुरु वह दीपक है जो अज्ञान मोह रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर करते हैं और संयम प्राप्त कर जीवन को धन्य करते हैं। यह उद्बोधन आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज के संयम समाधि दिवस पर विशेष पूजन की आयोजित गुणानुवाद धर्म सभा बांसवाड़ा कमर्शियल कॉलोनी में पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने व्यक्त किया। जगत में सभी प्राणी जानते हैं कि जो उत्पन्न या जन्म लेता है उसका मरण अवश्य होता है। जन्म लेकर जीवन कैसे जीते हैं यह महत्वपूर्ण है वर्तमान में जो कार्य कर रहे हैं उन कर्मों के बंध के आधार पर आगामी भव में फल मिलता है
हिमांशु जैन राजेश पंचोलिया अनुसारआचार्य श्री ने बताया कि आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज ने गृहस्थ अवस्था में मात्र 18 वर्ष की उम्र में आचार्य श्री वीर सागर जी के संघ में ब्रह्मचारी अवस्था में प्रवेश किया था मध्यप्रदेश आष्टा के पास भौरा ग्राम में श्रीमती रूपा देवी श्री झवरचंद जी के यहां आपका जन्म हुआ बचपन का नाम राजमल जी रखा ।आचार्य शिवसागर जी महाराज वर्षो पूर्व बांसवाड़ा आए थे तब मुनि अवस्था में आचार्य श्री अजित सागर जी और हम भी ब्रह्मचारी अवस्था में बांसवाड़ा आए थे। आचार्य शिवसागर जी को स्मरण कर संस्मरण में बताया कि उनका अनुशासन पिता के समान कठोर अनुशासन था जिस प्रकार पिता का अनुशासन संतान के सुख भविष्य के लिए सुखदाई होता है उसी प्रकार गुरु का अनुशासन शिष्य के लिए उपयोगी होता है। जो संतान या शिष्य पिता गुरु से बगावत कर बिखर जाते हैं पिता गुरु से दूर हो जाते हैं वह कभी सुखी नहीं होते हैं वृक्ष से टूटे पत्ते की तरह हो जाते ।गुरु कठोर होकर शिष्य के लिए अनुग्रह निग्रह करते हैं निग्रह से गुणों की वृद्धि होती है ,अनुग्रह माता के समान ममतामय होता है गुरु से शिष्य दूर होकर जीवन को संकट में डाल लेते हैं आचार्य अजित सागर जी का गुणानुवाद करते हुए आचार्य श्री ने भाव विभोर होकर अनेक गुणों की चर्चा कर बताया कि उनके मन में स्वाध्याय ज्ञान की चाहत पिपासा बहुत अधिक थी ,आप का एक संस्मरण बताया कि जब आचार्य वीर सागर जी से उन्होंने कहा कि मुझे उच्च अध्ययन करने के लिए मुरैना जाना है तब गुरु ने शिष्य से यही कहा कि पंख लग गए हैं पक्षी उड़ना चाहते हो ,ब्रह्मचारी राजमल जी ने उसी समय अपना विचार बदल दिया और कभी भी गुरु का साथ नहीं छोड़ा।
तृतीय पट्टाधीश दीक्षा गुरु आचार्य धर्म सागर जी के प्रसंग की चर्चा कर बताया कि जब वह बीमार थे समाधि का समय निकट था, श्री अजीत सागर जी मुनि अवस्था में अपने संघ के साथ अन्य नगर में थे उन्हें वहां आने के लिए जब संघ के साधुओं ने भी कहा तो चिंतक मननशील मुनि श्री अजीत सागर जी महाराज आचार्य धर्म सागर जी के पास चाहते हुए भी इसलिए नहीं गए कि लोग यही कहेंगे कि यह अंतिम समय में आचार्य पद लेने के लिए मेरे पास आ गए ।आचार्य श्री अजीत सागर जी ने समाधि का समय जानकर अपनी संयम साधना प्रारंभ कर दी थी क्योंकि आत्म साधक को तपस्या के बल पर अपने अंतिम समय का अनुभव और ज्ञान हो जाता है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि आचार्य अजीत सागर जी ने महाराज जी ने अनेक ग्रंथो की रचना स्वाध्याय कर उपलब्ध कराई। 4240 से अधिक श्लोक का ग्रंथ बनाया जिसका उपयोग कर धर्म लाभ होता है आचार्य वर्तमान सागर जी महाराज ने पूजन के दौरान चढ़ाए जाने वाले अध्र्य के माध्यम से आचार्य अजीत सागर जी के गुणों का बखान किया। उन्होंने बताया कि मेरे निर्बल कंधों पर आचार्य अजीत सागर जी ने आगामी पट्टाधीश का पद मुझे दिया और मैंने आचार्य श्री अजीत सागर जी और पूर्वाचार्यों की गौरव शाली परंपरा के अनुरूप संघ का संचालन संवर्धन करने का प्रयास किया। संघ के ब्रह्मचारी गज्जू भैया, संघस्थ श्रीमती तारा सेठी, किरण दीदी, निर्मलादीदी,प्रेमलता पाटनी,संगीता पंचोलिया सहित अनेक श्रावक श्राविकाओं ने पूजन में भक्ति पूर्वक पूजन की राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारीसंकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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