इच्छाएं आकाश की तरह विशाल हैं जिसकी पूर्ति कर पाना असंभव है स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

इच्छाएं आकाश की तरह विशाल हैं जिसकी पूर्ति कर पाना असंभव है स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन
परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी नेअपने मंगल प्रवचन में मन को नियंत्रित करने के साथ अभिमान नहीं करने की सीख दी।

 

 

 

पूज्य माताजी ने कहा कि इच्छाए आकाश की तरह विशाल हैं, जिनकी पूर्ति कर पाना असंभव है।उन्होंने कहा कि सागर में लहरें अनंत काल से उठ रही हैं वैसे ही इस जीव के अंदर जब से कर्म विद्यमान है तब से ही इच्छाओं के वशीभूत है। इंसान इच्छाओं की पूर्ति करने में लगा हुआ है, लेकिन इच्छाएं है कि समाप्त ही नहीं हो पा रही है। हमारा मन नियंत्रित है तो सब नियंत्रित है। मन नियंत्रण में नहीं है तो कुछ भी नियंत्रण में नहीं है। और सब कुछ गलत होता रहेगा। मन को जैसा सेट करेंगे वैसा ही सेट हो जाएगा। यदि हम सकारात्मक सोच रखेंगे तो उसे दिशा में आगे बढ़ते रहेंगे। लेकिन नेगेटिव थिंकिंग रखेंगे तो हमारा मन हमेशा गलत ही सोचता रहेगा। इसलिए हमेशा सही और सकारात्मक सोच ही मन में रखना चाहिए। ताकि मन नियंत्रण में रहे।

 

 

 

 

 

उन्होंने कहा कि इंसान के पास अधिक पैसा होने से अभिमान आ जाता है, और कम वाले में हीन भावना आ जाती है। इसीलिए मध्यस्थता बनाना है। सभी मनुष्यों में मध्यस्थता होना बहुत जरूरी है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खूब कमाओ, किसी को कोई परेशानी नहीं है। अच्छा खाना, पीना, अच्छा पहनना सब चाहते हैं। संसार में लड़ाई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं, इच्छाओं की पूर्ति के लिए है। माताजी ने कहा कि अगर दुख कम करना चाहते हैं तो इच्छाओं को कम कर दे। और दुख चाहते हो तो इच्छाएं बढ़ाते रहो। उन्होंने कहा कि चयन आपको करना है सुखी रहना है या दुखी रहना है। समय अभी भी नहीं निकला है। जीवन बहुत अनमोल है इसका मूल्य समझना होगा।

 

माताजी ने कहा कि असली तप हर परिस्थिति में मन की प्रसन्नता को बनाए रखना है। तप हमारी चेतना को निखारता है। कटु शब्द को सुनकर नजर अंदाज करना भी एक तप है। जो धर्म की शरण में आता है वह शीघ्र ही भव से पार हो जाता है। मनुष्य के जीवन में दुख का कारण उसके मन में आशा और तृष्णा के भाव है, जो विकारों को जन्म देते हैं। उससे बचने के लिए विकारों को त्यागना होगा जिनका कल्याण सुनिश्चित है, वे तप कर रहे है। आत्म शुद्धि का एकमात्र मार्ग तप है। आत्मा की भरोसे से जीने वाला भगवान बनता है। शक्ति के अनुरूप तप त्याग करना है। आत्मा का उद्धार करना है। उन्होंने कहा कि हमें प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम दया भाव रखना चाहिए। मानवता का यही धर्म है। गर्मी के दिनों में मुक पक्षियों के लिए परिंडे बांधना भी इंसानियत का एक नेक कार्य है।

 

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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