आचार्य सुनील सागर जी ने दिखाई राह,किन्तु चलेगा कौन?*लूटते रहेंगे तीर्थ क्योकि हम सब हैं मौन* संजय जैन बड़जात्या कामां
हम पहले भी मौन थे,आज भी मौन है और आगे भी मौन रहेंगे। क्योंकि मौन तो हमारी साधना है हमारा धर्म जिसका मुख्य सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म है वह इस बात को कहता है कि किंचित भी रंच मात्र किसी को दुख नहीं पहुंचना चाहिए, क्योंकि वह हिंसा की श्रेणी में आता है। लेकिन भगवान महावीर ने एक सिद्धांत और दिया जियो और जीने दो* अर्थात तुम खुद भी जियो और दूसरों को भी जीने का अधिकार दो और यदि वह आपको नहीं जीने देता है तो फिर मौन रहने की बात नहीं कही गयी।
इन दोनों सिद्धांतों का पालन करना हमारा दायित्व बनता है किंतु हम तो वही सिद्धांत पालन करेंगे जिसमें हमें, हमारे जीवन शैली में किसी भी प्रकार के संकट का सामना न करना पड़े।
यही हमारी अहिंसा परमोधर्म की नीति है। चाहे कोई आपके घर पर ही क्यों ना कब्जा कर ले लेकिन उससे उस घर को नहीं लेना चाहिए।उन्हें दुख होगा,मन अशांत होगा और ऐसा हम कर नही सकते।

विवेचना करने का समय किसी के पास नहीं है कि हम सिद्धांतों की आड़ में मौन है? या फिर जिस जीवन शैली को हम जी रहे हैं उसमें किसी भी प्रकार का विघ्न बाधा हम नहीं चाहते हैं हम पूर्ण रूपेण आरामदायक जीवन जीने की होड़ में मौन है?






अब कायर तो हम किसी को कह नहीं सकते, क्योंकि कायरता शब्द कहते ही आपके मन में भूचाल उठने लगेगा और आप भी अपनी कलम उठाकर कुछ ना कुछ लिखने का प्रयास अवश्य करेंगे। अरे जब इतने बड़े संत पूज्य आचार्य सुनील सागर जी महाराज ने एक मजबूत राह दिखाई है तो उस राह पर चलने का प्रयास तो करना चाहिए। खैर छोड़िये साहब हम सबकी तो मौन साधना चल रही है।
जय जिनेंद्र।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
