अन्तर्मना उवाच* 

धर्म

*अन्तर्मना उवाच* 

*समझदारी इसी में है कि* —
*जितनी चादर, उतने पैर फैलाओ..*
*अन्यथः कभी भी हाथ फैलाने की नौबत आ सकती है..!*

समय से पहले इच्छाओं को ना दबाया गया तो इच्छायें ही इन्सान की दुश्मन बन जाती है। *इच्छा और शौक इन्सान को बुराई की ओर आकर्षित करते हैं।* इन्सान इच्छाओं के चलते ही बचपन से संघर्ष और प्रयत्नशील हो जाता है, या यूं कहें कि इंसानी फितरत स्ट्रगल करने का स्वभाव हो जाता है।

 

 

 

 

यदि बच्चा चलने की कोशिश में, गिर कर खड़े होने की कोशिश ना करे तो वह अपाहिज हो जायेगा। मगर बच्चा बार-बार गिरने के बाद भी बार-बार खड़े होने की कोशिश करता है और यही कोशिश उसको बचपन से चलना और दौड़ना सिखा देती है।

 

 

 

*इन्सान को चाहिए कि वह बुराईयों से बचकर, बुरे शौक को दरकिनार कर अच्छाई की राह पर चले।* आज के इन्सान की सबसे बड़ी कमज़ोरी है कि इच्छाओं का गुलाम और बुरे शौक का दास बनकर जीना।

*हमारी जरूरत से ज्यादा बढ़ी हुई इच्छा और औक़ात से ज़्यादा शौक हमारे अच्छे खासे जीवन को शोक मय बना देते हैं…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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