मेरा मन पंछी ये बोले उड़ गुरु चरणों में जाऊं पंख बनू पीछी का शब्द शिल्पी-अवशेष जैन जबलपुर
मेरा मन पंछी ये बोले उड़ गुरु चरणों में जाऊं पंख बनू पीछी का मैं गुरु सेवा का सुख पाऊं
गुरु हाथों में इतराऊं,गुरु हाथों मे इतराऊं
समयसार का साथ लिए छोड़ा सारा संसार
संयम की पिच्छिका गुरू हाथों का लिये दुलार
लघु से लघु सूक्ष्म जीवों पर ना हो कोई प्रहार
संत सतत ही जीव जगत पर करते हैं उपकार
धर्म अहिंसा के पालन अपना सर्वस्व लुटाऊं
पंख बनुं पीछी…
एक हाथ में थाम कमंडल एक हाथ में पीछी
धर्म लक्ष्य को बढ़ें,निगाहें गुरुवर करके नीची
अमृत प्रवचन की वर्षा प्यासे प्राणों में सींचीं
जीवों की रक्षा के हेतु लक्ष्मण रेखा खींची रामकसम मुनि वैय्या व्रत का श्रेष्ठ मार्ग अपनाऊं
पंख बनुं पीछी का मैं…





पूर्ण दिगंबर ओढ़े अंबर वीतराग के पथपर
नदियां चलते चलते जैसे मिल जाती हैं सागर
देह मोह को त्याग तपस्या करते निश दिन भू पर
मुनिवर गुरुवर ऐसे ही कभी बन जाएंगे जिन वर
संयम व्रत की सहज संगिनी बनके धर्म निभाऊं
पंख बनुं पीछी का…
शब्द शिल्पी-अवशेष जैन जबलपुर 9252162801,0872717
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
