गुरु तो मन में विराजमान है और सदा रहेंगे विराटसागर महाराज
कुंडलपुर
मंगलवार की अनुपम बेला में सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में पूज्य मुनि श्री 108 विराटसागर महाराज ने धर्म सभा में कहा कि संपूर्ण प्रकृति का यदि कोई मूल तत्व है, जिससे संपूर्ण प्रकृति संचालित होती है तो वह तत्व प्रेम है, वात्सल्य है।
महाराज श्री ने कहा कि धर्म का संचालन अनुशासन से होता है, यदि प्रेम नहीं है तो क्या आप चार कदम धर्म की राह पर चल पाएंगे, असंभव सा प्रतीत होता है। कलिकाल है, सब जानते हैं जिस राह पर आगे बढ़ रहे हैं मंजिल तो दिखाई देती है, पर वहां पहुंच नहीं पाएंगे।
रास्ता अवरुद्ध है, फिर भी उस पर चले जा रहे हैं। हमें आत्मा से लगाव और प्रेम है। संपूर्ण व्यवस्थाएं सही रूप से चलना है।




एक दूसरे के प्रति गहरा प्रेम, वात्सल्य, स्नेह होना जरूरी है। एक गुरु की संतान है, सभी मुट्ठी बांधकर एक प्रेम की तरह कुटुंब की तरह रहे, तो हमारा विश्वास है, जिस तरह गुरुजी के शासन काल में संघ ने महती प्रभावना की थी, उससे कई ज्यादा यह संघ आज प्रभावना कर सकता है। उसकी नीव, उसका मूल मंत्र है, आपसी प्रेम।
महाराज श्री ने कहा कि शास्त्र तो ज्यादा मेने नहीं पढ़े, गुरु की आज्ञा, आगम की आज्ञा शिरोधार्य है। गुरु तो मन में सदा विराजमान है और विराजमान रहेंगे। अंतिम सांस तक। उन्होंने कहा क्या सोच रहे हैं, सोचने का तो प्रश्न ही नहीं होना चाहिए। जो कह दिया स्वीकार है। जब तक प्रेम बंधन नहीं जागेगा, तब तक अनुशासन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने ध्यान इंगित करते हुए कहा कि सबकी ड्यूटी बनती है, हर पिछीधारी की जो संघ का अनुशासन गुरु के समय से चला आ रहा है, अंतिम सांस तक यह अनुशासन चलता रहे। एक माला का गुरु महाराज जी ने सबके सामने निर्माण किया था। वह माला एक सूत्र में चलती है, सारे मोती साथ में है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
