अहिंसा का व्यापक स्वरूप समता है आचार्य कनकनदी गुरुदेव
सागवाड़ा
समता शिरोमणि वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने योगेंद्र गिरी से अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि समता में समस्त धर्म गर्भित है। अहिंसा का व्यापक स्वरूप समता है। खलु अर्थात निश्चय से चारित्र ही धर्म हैं। समता मूल धर्म हैं।
महाराज श्री ने कहा भाव अस्थिर होना क्षोभ है। मन की चंचलता को भी क्षोभ कहते हैं। शारीरिक मानसिक सभी समस्याओं का मूल कारण क्षोभ हैं। अनुभव ही यथार्थ से आत्मा है। आत्मवंचना करना स्वयं को ठगना स्वयं की आत्मा का पतन करना है। अपराध बोध होने से आनंद व शांति का अनुभव करते हैं। क्षोभ घृणा डिप्रेशन तनाव शारीरिक बीमारियों आदि सबका कारण हम स्वयं ही हैं। हारमोंस डीएनए आरएनए जिनोम पुण्य पाप आदि के कारण हमारे मन के भाव है।




आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार हमारे शरीर पर कई टन वजन होने पर हम चल नहीं पाते हैं कोई कार्य नहीं कर पाते हैं वैसे ही हमारे सर पर तनाव क्षोभ टेंशन डिप्रेशन होने पर हम कोई कार्य नहीं कर पाते हैं। आचार्य ऋषि के पास पढ़ने से पहले परप्रपंच में पडने के कारण आत्म प्रशंसा नहीं कर पाते थे। स्वयं को प्रेम करना ऑटो सजेशन है। समता में समस्त धर्म तथा विषमता में समस्त अधर्म है। समता से रहित साधु यदि जंगल में रहे एकांत में रहे पर्वत के शिखर पर तपस्या करें ध्यान करें अध्ययन करें मौन रहे उपवास करें तो भी वह स्वयं का कल्याण नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा जंगल में रहने वाले सभी समता में नहीं रहते, चोर चोरी करते समय शेर चीता शिकार करते समय मौन रहते हैं स्थिर रहते हैं धीरे धीरे चलते हैं यह कोई समता नहीं है। समता ही समाधि है। आचार्य श्री ने बताया कि मोह तथा क्षोभ से रहित परिणाम होने चाहिए। अनंत दुख का मुख्य कारण कुचरित्र राग द्वेष मोह आदी है। जिस प्रकार वृक्ष को जड़ से उखाड़ने पर पेड़ की पत्तियां डालियां स्वयं सूख जाती है इस प्रकार मोह नष्ट होने से सभी दुख स्वयंमेवं नष्ट हो जाएंगे। शरीर के सभी अंग शरीर से जुड़े रहते हैं तभी सुख दुख का अनुभव करते हैं अलग हो जाने पर नहीं करते हैं। वैसे ही जो धर्म आत्मा से समता से पवित्रता से जुड़ा हुआ है वह धर्म हैं। समता शांति से जुड़ा हुआ नहीं है वह अधर्म है जिस प्रकार शीतल जलाशय में सोने का टुकड़ा चांदी का टुकड़ा पत्थर कंकड़ कुछ भी डालने पर जलाशय में तरंगे उत्पन्न होती है वैसे ही हमारे मन में जैसे भाव होते हैं वैसे कर्म बंध होते हैं जिससे मन अस्थिर होता है। जिस उम्र में आनंद उत्साह तनाव रहित होना चाहिए उस उम्र में वर्तमान में बच्चे अधिक दबाव में टेंशन में रहते है। स्वआत्म श्रद्धान रूपी सम्यकत्व नहीं होता तब तक उदारता दृढ़ता नहीं आ सकती । हमारा चित्त विकार रहित , अमृत स्वरूप ,आनंद स्व रूप, निर्विकार, निश्चय चरित्र से सहित ,प्रवृत्ति मोह रहित होनी चाहिए। जहां मोह होगा वहां क्षोभ रहेगा। तीर्थंकर भी गृहस्थ अवस्था में मोह क्षोभ से रहित नहीं हो पाये। हमारे विभाव ही हमारे स्वशत्रु ,स्वरोग,अशांति स्वपराधीनता के कारण है। उनको नष्ट करना , उनका विध्वंस करना ही अहिंसा है। ना स्वयं को हीन मानना ना अहंकार करना ना प्रतिस्पर्धा करना जिससे शुद्ध चैतन्य परिणाम परम सुख प्राप्त होगा इससे सभी रोग दूर होंगे।
एक जानकारी देते हुए महाराज श्री ने कहा की मस्तिष्क के पार्श्व भाग में हारमोंस का स्राव होता है आंनद से डिपोमेंन, सेराटोन, एण्डोटिन आदि अच्छे हारमोंस का स्राव होता है। आनंद के क्षण में इनका स्राव बढ़ जाता है। जिससे दुख का अनुभव नहीं होता है। मस्तिष्क में अरबो खरबो न्यूरोन विद्युत चार्ज की तरह चार्ज होते हैं। यदि हम खोटे विचार करते हैं तो उस समय न्यूरोन नेगेटिव चार्ज होते हैं जिससे पूरे ब्रह्मांड से नेगेटिव परमाणु आकर आत्मा से बंध जाते हैं। जिससे पूरा शरीर प्रभावित होता है। खोटे भाव ही क्षोभ हैं। पूरे आत्म प्रदेशों पर इसका प्रभाव पड़ता है। राग द्वेष काम क्रोध आदि असमता से पूरे ब्रह्मांड से नेगेटिव परमाणु खींचकर आते हैं और वह पूरे शरीर पर प्रभाव डालते हैं। जब जीव निगोद पर्याय में एक केंद्रीय आदि में शरीर से कुछ भी पाप नहीं करता है परंतु भाव पाप से भाव कलंक से ही दुख प्राप्त करता है। इसलिए आचार्य श्री कहते हैं परम सुख परम धर्म परम औषधि परम अमृत समता है। रात्रि में भूत प्रेत नहीं होने पर भी डर लगता हैं। बोतल में शराब होने पर बोतल नाचती नहीं है परंतु जब व्यक्ति उसे पी लेता है तो वह भ्रमित हो जाता है नाचने लगता है। इस प्रकार पूरी ब्रह्मांड में कर्म परमाणु भरे हुए हैं परंतु वह हमारी आत्मा के भावों के अनुसार प्रभावित करते हैं निर्जीव वस्तु से निर्जीव प्रभावित नहीं होता है निर्जीव वस्तु से संजीव ही प्रभावित होता है।
वेबीनार में स्पेन से जुड़ी गीतिका जैन ने स्वरचित कविता अनेकांत धर्म के तले धर्म का बगुल बजे कविता प्रस्तुत की आचार्य श्री की ज्ञान तथा साहित्य रचना की प्रशंसा करते हुए बताया कि जब तक हम आचार्य श्री के साहित्य का रसपान नहीं करेंगे तब तक हम आचार्य श्री के सिग्नेचर अपनी आत्मा पर कैसे लेकर जा सकते हैं आचार्य श्री के साहित्य को पढ़ना उनसे ज्ञानार्जन करना ही हमारी आत्मा के विकास का मुख्य कारण है। विजयलक्ष्मी जैन गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
