अन्तर्मना उवाच बसन्त आता है तो प्रकृति मुस्कुराती है, और*सन्त आता है तो संस्कृति मुस्कुराती है..!*

धर्म

*अन्तर्मना उवाच बसन्त आता है तो प्रकृति मुस्कुराती है, और*सन्त आता है तो संस्कृति मुस्कुराती है..!*

बसंत ऋतु को प्रकृति का त्योहार माना है। वसन्त को ऋतुराज माना है, यानि ऋतुओं का राजा। जो बसंत का एहसास करते हैं, उन्हें पता है कि ऋतुओं की भीड़ में बसंत को ही राजा माना गया है।

 

एयरकंडीशनरो के दौर में धनपतियों ने इन मौसमों को नियंत्रित कर लिया है, उनके कमरे, दफ्तरों और कारों का तापमान कमोबेश एक सा रहता है, ऐसे में कैसे एहसास हो कि कब बसंत आया और कब चला गया।

यह तो फुटपाथ पर ज़िन्दगी जीने वालों से पूछो कि जब ठण्ड आती है तो शोर मचाते हैं और गर्मी आती है तो तड़पते हैं।

 

बसंत ऋतु समृद्धि और सौंदर्य के सृजन का एक अद्भुत त्योहार है। समृद्धि नई फसलों के रूप में और सुन्दरता प्रकृति के मनोरम दृश्यों के रूप में उभरती है। यह सब बसंत ऋतु में ही सम्भव है कि बगैर बारिश के प्रकृति नए रूप में पल्लवित और पुष्पित होती दिखाई देती है। क्योंक
बसंत ऋतु में प्रकृति सोलह कलाओं से खिल उठती है। बसंत का आगमन माघ शुक्ल पंचमी से प्रारंभ होता है और फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा होलिकोत्सव के साथ समापन हो जाता है। रंगोत्सव यानि बुराईयों पर अच्छाईयों की विजय पताका फहराने का नाम है बसंतोत्सव।

रंग ऐसा भरो, रंग ऐसा भरो*
ना रंग नफरत का हो, ना रंग मजहब का, रंग ऐसा भरो
जिसके छींटों में बस प्यार ही प्यार हो

मैं भक्तों से कहता हूं –
मैं रंग हू भक्तों के चेहरे का
तुम जितना मुस्कुराते हो
हम उतना ही निखरते जाते हैं…!!!

सभी को अनन्त शुभसंशाओ सहित आशीर्वाद।

नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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