अन्तर्मना उवाच* (24 मार्च) दान दिया जाता है और त्याग किया जाता है..*दान पर वस्तु का और त्याग स्व विकारों का..!
*दान दिया जाता है और त्याग किया जाता है..*
*दान पर वस्तु का और त्याग स्व विकारों का..!*
दान से मन प्रसन्न होता है, और त्याग से चेतना।
दान सब करना चाहते हैं, पर त्याग कोई कोई।
*अज्ञान* – अविवेक-भोग-विलासता है,, और *ज्ञान* – सद-विवेक-त्याग है।

त्याग में ठहराव है, और दान में इच्छा-अभिलाषा-प्राप्ति का भाव।
दान करना पड़ता है, और त्याग हो जाता है। तब, भीतर का ज्ञान और विवेक सक्रिय होते हैं।

त्याग-ज्ञान-विवेक का सहज परिणाम है,, भोग-विलास-अज्ञात मन की सहज परिणति है या बुद्धि का विकार भाव।
त्याग में जो भी छूटता है वह निर्मूल्य है, और जो पाया जाता है वह अमूल्य है।




क्योंकि हम जो भी त्याग करते हैं, उसमें बहुत कुछ ब्याज सहित मिल जाता है। *सच तो यह है कि* —हम बन्धनों को छोड़ते हैं, और पाते हैं मुक्ति।कंकड़ पत्थर को छोड़ते हैं, और पाते हैं रत्नत्रय के हीरे जवाहरात।छोड़ते हैं जहर, और पाते हैं अमृत।
अन्धकार को छोड़ते हैं, पाते हैं प्रकाश।छोड़ते हैं मोह, पाते हैं मोक्ष।*छोड़ते हैं संसार, और पाते हैं शाश्वत सुख…!!!*नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त संकलन के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
