श्री पार्श्वनाथ समवशरण नूतन जिनालय में पार्श्वनाथ भगवान सहित चौबीसी भगवान विराजित। मोक्ष कल्याणक प्रभावना,भक्ति पूर्वक सानंद संपन्न। 
पारसोला श्रद्धा,आस्था,विश्वास,विनय और भक्ति से मोक्ष की राह प्रशस्त होती हैं श्री पार्श्व नाथ भगवान के मोक्ष गमन कर सिद्धालय विराजित होते ही पंचकल्याणक पूर्ण हो गया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सानिध्य में 4 मार्च से 8 मार्च का श्री पार्श्वनाथ पंच कल्याणक मोक्ष कल्याणक से प्रभावना के साथ पूर्ण हुआ। भव्य जीव तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं ,जैसे आप मकान की सीढ़ी चढ़कर अंतिम मंजिल सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करते हैं ठीक उसी प्रकार भव्य जीव दीक्षा धारण कर भगवान बनकर आत्मा की विशुद्धता को बढ़ाते हुए गुण स्थान के क्रम से गुण स्थान रूपी सीढ़ी का आरोहण करते हैं उसके लिए आत्मा की
विशुद्धता का विस्तार करते हुए आत्मा पर लगे कर्मों को नष्ट कर तीर्थंकर भगवान ज्ञान पूर्ण होकर केवल ज्ञान प्राप्त करते हैं ।उसके लिए आत्मा पर लगे कर्म नष्ट होना जरूरी है ।संसार के अंतिम लक्ष्य वास्तविक सुख सिद्धालय तक पहुंचने के लिए 8 कर्मों को नष्ट करना होता है ।
ज्ञान की चरम सीमा केवल ज्ञान है ,केवल ज्ञान होने पर ज्ञान पूर्ण हो जाता है।यह मंगल देशना पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मोक्ष कल्याणक के अवसर पर प्रगट की। ब्रह्मचारी गज्जू भैय्या,राजेश पंचोलियां ,विनोद अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि जब आप भी पुरुषार्थ कर कमर कस कर आत्मा पर लगे कर्मों को नष्ट करने का पुरुषार्थ करेंगे तो आप भी सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। और संसार परिभ्रमण जन्म मरण से मुक्त हो जाएंगे ।किसी भी कार्य को सिद्ध करने के लिए कठोर पुरुषार्थ करना होता है पंचकल्याणक का उदाहरण आपके सामने है कितने पुरुषार्थ कर कितने वर्षों की प्रतीक्षा कर अपने लक्ष्य को प्राप्त किया ।किसी भी प्राणी का संसार में रहना लक्ष्य नहीं है आप प्रतिदिन कार्य करके ,लौकिक कार्य करके थक जाते हैं ,यात्रा में थक जाते हैं तो आपकी यही इच्छा होती कि हम अपने घर जाए वहां में सुख और शांति मिलेगी ।भव्य आत्मा जो तीर्थंकर बालक होते हैं वह भी संसार परिभ्रमण से थक कर वास्तविक सुख शांति प्राप्त करने के लिए दीक्षा लेकर आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं गर्भ कल्याणक से मोक्ष कल्याणक की यात्रा में संसारी प्राणी के कल्याणक नहीं मनाए जाते। कल्याणक केवल उसी के मनाए जाते हैं जिनका गर्भ हो या जन्म हो ,अंतिम हो वह दोबारा इस भूमि पर अवतरित नहीं होते हैं भगवान का जन्म अंतिम होता है इस कारण उनका कल्याणक मनाया जाता है ।पुरुषार्थ करने से धर्म का अनंत सुख मिलता हैआचार्य श्री ने पंच कल्याणक के नाटकीय दृश्य से प्रेरणा लेकर स्वाध्याय करने पर जोर दिया जिनागम का स्वाध्याय कर उसे जीवन में स्थाई बनाए ।सुबह आपने मोक्ष कल्याणक से अवसर पर मोक्ष जाने की प्रक्रिया देखी आप भी कर्मों को नष्ट कर सिद्धालय जाने का पुरुषार्थ कर मानव जीवन को सफल बनाने के प्रयास करे।संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायश मति जी ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 5 वी बार सन 2024 में प्रवेश हुआ इसके पूर्व सन 1990, 1997,2002 तथा 2004 में प्रवेश हुआ था ।पारसोला जिनालयों,साधुओं की जन्म ,दीक्षा,समाधि, भूमि हैं 1008 श्री पार्श्वनाथ दिगंबर बड़ा मंदिर, श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, श्री पदम प्रभु चेत्या लय श्री महावीर भगवान चैत्यालय श्री शांतिनाथ भगवान चैत्यालय एवम् नवनिर्मित समवशरण से सुशोभित नगरी पारसोला के नगर गौरव मुनि श्री धर्मेंद्र सागर जी ,मुनि श्री ओम सागर जी, मुनि श्री सक्षम सागर जी, मुनि श्री समप्रतिष्ठित सागर जी, आर्यिका श्री गोम्मटमतीजी, आ श्री पूर्वी मतीजी ,आ श्री अभिन्न मतीजी, आ श्री मुदित मति जी ,आ श्री संगीतमति जी इस नगर के गौरव रत्न है। इसी नगर में सन 1990 में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मुनि ओम सागर जी एवम आर्यिका वैराग्य मति जी को दीक्षा दी। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में सन 1997 में क्षुल्लक श्री नम्र सागर जी की सन 2002 में आर्यिका श्री सौम्य मति जी की,सन 2004 में आर्यिका श्री सुप्रभा मति माताजी की समाधि हुई।श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव का समापनः दिगंबर दशा हुमड जैन समाज के अध्यक्ष तथा श्री पार्श्वनाथ समवशरण जिन बिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव कमेटी अध्यक्ष ने बताया कि आचार्यश्री वर्धमान सागर ससंघ सान्निध्य में हुए कार्यक्रम मंदिरों में प्रतिमा विराजमान के साथ शिखरों पर कलशरोहण ध्वजारोहण केवल ज्ञान संस्कार क्रिया संहिता सूरी पंडित हँसमुख शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य के कुशल निर्देशन में संपन्न हुई ।वहीं 8 मार्च को अग्निदेव द्वारा सत्कार विधि व मोक्ष कल्याणक पूजा का आयोजन किया गया। विसर्जन कार्यक्रम के साथ ही महामहोत्सव का समापन हुआ।वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में महामहोत्सव का विसर्जन श्रीमद आदिनाथ एवम् चौबीसी जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव के अंतिम दिन को ध्यान व आशीर्वाद सभा, श्री जिनाभिषेक एवं नित्यार्चन, मोक्षकल्याणक दृश्य का आयोजन किया गया। वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में अग्निदेव द्वारा संस्कार विधि, मोक्ष कल्याणक पूजा, हवन, पूर्णाहुति की गई।इसके पूर्व आचार्यश्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन और आचार्य श्री को पुण्यार्जक परिवार द्वारा किया गया। वहीं श्रीजी को रथयात्रा के माध्यम से नूतन समवशरण जिनालय दिगम्बर जैन मंदिर लाया गया। संघ सानिध्य में श्री नूतन बेदीयो पर पुण्यार्जक परिवारों द्वारा श्री आदिनाथ भगवान से महावीर स्वामी सहित अनेक प्रतिमाएं विराजित कर सौभाग्य शाली परिवार द्वारा अभिषेक किया गया। नूतन शिखरों पर पुण्यार्जक परिवारों द्वारा कलशारोहण एवम नूतन जैन ध्वजा लगाई गई ।दिनांक 8 मार्च 2024 नव निर्मित समवशरण जिनालय में वात्सल्य वारिधि श्री 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सानिध्य मे नूतन 24 भगवान की ,चार मान स्तम्भ में तथा चार प्रतिमाएं सबसे ऊपर पुण्यार्जक परिवारों द्वारा विराजित होकर , ध्वज दंड एव’कलश आरोहण प्रातः किया गया । दोपहर को विसर्जन के साथ महोत्सव का समापन हुआ।
श्री पदाधिकारियों ने महामहोत्सव के दौरान आवास, भोजन, यातायात, जुलूस व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था, पूजन विधान व कलश वितरण, मंच व्यवस्था आदि समितियों के निस्वार्थ सराहनीय सहयोग का आभार जताया।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 
