अन्तर्मना उवाच (16 फरवरी!) मनुष्य की चाल दो बार बदलती है प्रसन्नसागर महाराज
मनुष्य की चाल दो बार बदलती है —
एक — धन बढ़ता है तो अकड़ आती है, और दो — धर्म बढ़ता है तो विनम्रता आती है।
हे परमात्मा! ज़िन्दगी–भले ही तू छोटी देना, मगर ऐसी ज़िन्दगी देना कि सदियों तक लोगों के दिलों में जिन्दा रहूँ और हमेशा सत्कर्म सेवा से जुड़ा रहूँ। 






अब समय कम और कार्य ज्यादा है जीवन में। समय — समय है, वह किसी के बाप का नौकर नहीं है, समय खुद अपना मालिक है। समय किसी का इन्तजार नहीं करता, ना किसी से इकरार करता है। समय कभी पीछे मुड़कर भी नहीं देखता। अभी दो बजे थे, अब तीन बज गये। मौत भी एक घंटे आगे सरक गई। कल शनिवार था, आज रविवार है।
ज़िन्दगी का एक दिन हमारे हाथ से चला गया, फिर भी हम टाइम पास करने में लगे हैं। मित्रो! हम टाइम पास नहीं कर रहे हैं, बल्कि टाइम — हमें पास कर रहा है…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
