स्वयं की आत्मा ही तीर्थ :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
गुंसी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुंसी (राज.) में ससंघ सहित धर्म साधना में प्रवृत्त गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी अपनी उत्कृष्ट साधना करते हुए व्रती आश्रम में रहने वाले सभी वृतियों को अध्ययन अध्यापन करवा रही है ।
माताजी ने सभी को धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – जिसकी
चित्तप्रवृत्ति पवित्र है, उसको सम्पूर्ण जगत् ही तीर्थ है । चित्तप्रवृत्ति पवित्र है, तो स्वयं की आत्मा ही तीर्थ है जिसकी चित्त प्रवृत्ति पवित्र नहीं है, वह तीर्थक्षेत्र में पहुँचकर भी क्षेत्र को नहीं निहार सकता है । आवश्यकता है चित्त की प्रवृत्ति को पवित्र करने की । जीवन के अंतिम समय के सैकड़ों खण्डों में से एक समय प्रमाण भी यदि परिणाम पवित्र हो गए तो कल्याण हो जायेगा ।



स्वयं का कल्याण परमात्मा के आश्रित नहीं है, तीर्थ के आश्रित नहीं है, गुरु के आश्रित नहीं है, जिनवाणी के आश्रित नहीं है, अपितु मेरा कल्याण मेरे चित्त की प्रवृत्ति की पवित्रता के आश्रित है । जिसका चित्त अशांत है, चित्त विकल्पों में, चिन्ता से भरा है, उसे सुख कहाँ ? आनंद कहाँ ? आनंद है तो मात्र चित्त की पवित्रता में है ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
