धर्म पात्र महाव्रती को आहार ,ज्ञान, अभय और औषधि दान उत्तम श्रेष्ठ दान होता हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

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धर्म पात्र महाव्रती को आहार ,ज्ञान, अभय और औषधि दान उत्तम श्रेष्ठ दान होता हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
श्री ऋषभ देव केशरिया जी कर्मोदयाद्देव धनेन हीनः । कस्मात्प्रभोऽयं भवतीह जीवः ।।यह संसारी जीव किस कर्मके उदयसे व कैसे काम करनेसे धनहीन होता है?व्ययं सुपात्रे न धनस्य कृत्वा, हठाद्धनं यश्च परस्य हृत्वा । तुष्येत्परं वा कृपणं च दृष्ट्वा, हीनो धनैश्वान्यभवे भवेत्साःजो पुरुष सुपात्रोंके लिए अपना धन खर्च नहीं करते, अथवा जो पुरुष बलपूर्वक दूसरों के धनको हरण कर लेते हैं, अथवा जो पुरुष अन्य कृपणोंको देखकर संतुष्ट होते हैं, ऐसे पुरुष दूसरे भवमें जाकर धनहीन होते हैं। 

यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने ऋषभदेव में धर्म सभा में प्रकट की। आचार्य श्री कुंथू सागर जी के भव त्रय फल प्रदेर्शी के श्लोक का अर्थ बतलाया कि धनकी प्राप्ति दानसे होती है। जो पुरुष पात्रदान किया करते हैं उनको भोगभूमिकी प्राप्ति होती है। भोग-भूमिमें धनकी चिन्ता ही नहीं करनी पड़ती। वहाँपर कल्पवृक्षोंसे इच्छानुसार पदार्थोंकी प्राप्ति होती रहती है । अथवा पात्रदान देनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। स्वर्गमें भी धनकी चिंता नहीं करनी पड़ती, वहाँपर भी कल्पवृक्ष है अनेक प्रकारकी विभूतियाँ हैं और मानसिक आहार है। देवोंको जब भूख लगती है तभी उनके कंठसे अमृत झर पड़ता है। इस प्रकार वे देव भी सर्वथा निश्चित रहते हैं।  ब्रह्मचारी गजू भैय्या ,राजेश पंचोलिया योगेश गंगावत अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि मनुष्योंमें जो धनी देखे जाते हैं उनको भी धनकी प्राप्ति पूर्वजन्ममें दिये हुए दानके फलसे ही होती है। अतएव यदि पुरुषोंको आगेके जन्ममें भी धन प्राप्त करना हो तो उनको पात्र को दान देना चाहिए किन कारणों से मानव गरीब निर्धन होता है इसकी विवेचना में आचार्य शिरोमणी श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि श्रावक को सदाकाल पात्र दानमे ही अपना धनखर्च करना चाहिये । दान देनेवे भी पात्र-अपात्र व कुपात्र का विचार अवश्य करना चाहिये । कुपात्र व अपात्रोको दिया हुआ धन श्रेष्ठ दान नहीं कहलाता, उस दानका फल दुःखरूप ही होता है। इसलिए पात्रोंको दिया हुआ दान ही श्रेष्ठ दान कहलाता है। जो पुरुष रत्नत्रयसे पवित्र है उनको पात्र कहते हैं। उनमे रत्नत्रयसे सुशोभित मुनि उत्तमपात्र कहलाते है, व्रती श्रावक मध्यमपात्र कहलाते हैं और सम्यग्दृष्टि अव्रती श्रावक जघन्यपात्र कहलाते हैं। ये सब पात्र धर्मपात्र कहलाते हैं। इनको आवश्यकतानुसार दान देना चाहिये। मुनियोंको आहारदान, शास्त्रदान, पिछी, कमंडलु, औषध आदि देना चाहिए। ऐलक, क्षुल्लक, आर्यिका, क्षुल्ल्किा, ब्रह्मचारी आदिको आवश्यकतानुसार आहारदिक व वस्त्रादिक देना चाहिये । श्रावकोंको आहारदान आदि समानदान देना चाहिए अथवा उनकी आवश्यकताको समझकर देना चाहिए। किसी किसी श्रावकको धर्मकी दृढताके लिए, धन, वर्तन, वस्त्र आदि भी दिए जाते हैं। इस प्रकार धर्मपर श्रद्धा रखकर दान देनेसे धनकी प्राप्ति होती है। जो पुरुष धन पाकर भी पात्रदान नहीं करते उनका धन व्यर्थ ही समझना चाहिये। ऐसा धन जले हुए बीजके समान है। जैसे जले हुए बीजसे दूसरा अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार बिना पात्रदान दिए दूसरे जन्ममें धनकी प्राप्ति नहीं हो सकती। तथा बिना धनके वह फिर पात्रदान आदि पुण्यकार्य नहीं कर सकता। इस प्रकार वह पुरुष जन्म-जन्मांतर तक निर्धन बना रहता है। इसी प्रकार जो पुरुष बलपूर्वक दूसरोंका धन छीन लेता है। वह भी अगले जन्ममें निर्धन ही होता है। क्योंकि धन छीनने वाला लोभी पात्रदानादिक कर ही नहीं सकता तथा धन छीन लेने के साथ-साथ उस धनीके पात्रदान आदि पुण्यकायोंको भी छीन लेता है। क्योंकि धन छिन जानेके कारण वह धनी भी पात्रदानादिक नहीं कर सकता। आगामी 11 फरवरी 2024 से 15 फरवरी तक नूतन चौबीसी का पंच कल्याणक गुरुकुल में होगा। इसके लिए भव्य पंडाल की तैयारी चल रही हैं गुरुकुल, पंच कल्याणक समिति एवम् सकल दिगंबर जैन समाज केसरिया जी के पदाधिकारियों ने सभी से धर्म लाभ लेने का अनुरोध किया है राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी।   

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