जैन धर्म का मूल अहिंसा :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
गुंसी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ , गुंसी (राज.) में विराजमान वात्सल्य सरिता गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी के ससंघ सान्निध्य में आज की शांतिधारा करने का सौभाग्य मुन्नालाल अमित जैन गौरझामर एवं आशीष जअर्हम जैन जयपुर वालों ने प्राप्त किया ।
प्रवचन सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – सभी प्राणी मात्र पर दया , करुणा , मैत्रीभाव रखना यह जैन धर्म का मूल सिद्धांत है । इसी भावना से निःस्वार्थ वृत्ति , परोपकार , वात्सल्य वृत्ति का जन्म होता है । ये गुण मनुष्य के लिए पूज्य बनाते हैं । सन्त महात्मा बनाते हैं । सभी धर्मों में अहिंसा और दया को ही धर्म का मूल बताया गया है । मन में किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वार भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी कि हिंसा न करना, यह अहिंसा है। जैन धर्म में अहिंसा का बहुत महत्त्व है।



जैन धर्म के मूलमंत्र में ही अहिंसा परमो धर्म: (अहिंसा परम (सबसे बड़ा) धर्म कहा गया है। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिये जो आन्दोलन चलाया वह काफी सीमा तक अहिंसात्मक था।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
