आप आजीविका के लिए ज्ञान न करे धर्म का जीवन के लिए करे,आजीविका की गारन्टी मेरी है, जिनवाणी माँ की है, जिनेंद्र देव की है। सुधासागर महाराज
आगरा
हरीपर्वत स्थित श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में श्री दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान के तत्वावधान में तीन दिवसीय स्नातक परिषद अधिवेशन एवं युवा परिषद संगोष्ठी का आयोजन चल रहा है| जिसके दूसरे दिन 27 अक्टूबर को अधिवेशन का शुभारंभ भक्तों ने श्रमण संस्कृति के युवा विद्वान ने संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं निर्य़ापक श्रमण मुनिपुगंव श्री को नमन करते हुए मंगलाचरण की प्रस्तुति के साथ किया|
मंगलाचरण के बाद विशिष्ट अतिथियों ने चित्र अनावरण और दीप प्रज्जवलन किया| सौभाग्य शाली भक्तों ने मुनिश्री का पादप्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया| इसके बाद मुनिपुगंव श्री ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जिनेंद्र देव यह नही कहते है कि मैंने जान लिया तुम्हे कोई जरूरत नही, जिनेंद्र देव कहते है मैंने जो जाना है उसे तुम भी जानो जिससे तुम यह न कह सको कि जिनेंद्र देव के जाने हुए ज्ञान से हमारी जिंदगी चल रही है। तुम खुद जानो कि जिनेंद्र देव क्या जानते है। तुम खुद समझो कि जिनेंद्र देव ने जो कहा है वो कितना सत्य है और उस सत्यता को जब आत्मा से निकलने लगे जाता है तब यह भगवान की जिनवाणी हमारे आत्मा का श्रुतज्ञान बन जाता है।

कुन्दकुन्द भगवान ने शब्द दिए है ज्ञान नही दिया, जिनेंद्र भगवान शब्द दे सकते है ज्ञान नही क्योंकि ज्ञान का आत्मा के साथ समवाह सम्बंध है,तादात्म्य सम्बन्ध है। भगवान का जो ज्ञान है वो उनके पास रहेगा हमारे पास नही आ सकता। जब ज्ञान दे ही नही सकते तो भगवान ने हमे ज्ञान नही दिया शब्द दिए और शब्दों में ऐसा अर्थ निहित कर दिया कि उस अर्थ को हमे पकड़कर के हमारी ज्ञान की पर्याय बन जाये। जो शब्द हमने सुने है वो तो द्रव्य श्रुत है,उपचार से ज्ञान है। जो शब्द हमारे कानो में पड़े है वो शब्द हमारे श्रुतज्ञान को उत्पन्न होने में निमित बने और वो ज्ञान हमारा जो जाए। जिनगुण सम्पत्ति होऊ मज्झम जिनेंद्र भगवान का ज्ञान हमारा ज्ञान बने इसके लिए श्रमण संस्कृति ही समर्थ है। विश्व मे ऐसा कोई भी दर्शन नही है जो भगवान के समान बने का अधिकार देता है और श्रमण संस्कृति का मुख्य उद्देश्य यही है कि भगवान जो जान रहे है उससे ही नही मानना ये श्रमण संस्कृति नही है, ये तो भगवान संस्कृति है, ये तो श्रद्धा की संस्कृति है।श्रमण संस्कृति का अर्थ है जो भगवान जानते है उसे मैं भी जानूँगा इसका नाम है श्रमण संस्कृति। भगवान हमारे मालिक नही है,भगवान हमारे सीनियर है और हम उनके जूनियर है, वो हमसे एक कदम आगे चले है, हम उनके कदमो पर चल रहे है लेकिन चल हम भी रहे है। आप आजीविका के लिए ज्ञान न करे धर्म का,जीवन के लिए करे,आजीविका की गारन्टी मेरी है, जिनवाणी माँ की है, जिनेंद्र देव की है। जीवन यदि तुम्हारा लक्ष्य है तो आप कभी भी किताब पढ़ने के बाद भूलेंगे नही, शास्त्र पढने के बाद वो तुम्हारी जिंदगी में रहेगा। यदि जीवन के लिए पढा है तो जिंदगी भर आपका स्वाध्याय होना चाहिए।

इस स्नातक परिषद अधिवेशन एवं युवा राष्टीय विद्वत संगोष्ठी के तीन दिवसीय आयोजन में पूज्यश्री कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित पंचास्ती काय ग्रंथ पर अनेक विषयों पर आलेख लिखकर महान युवा विद्वान यहां पहुंचे हैं





और निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में अपने द्वारा लिखित आलेखों का वाचन कर रहे हैं।मीडिया प्रभारी शुभम जैन के मुताबिक स्नातक परिषद अधिवेशन एवं युवा परिषद संगोष्ठी का समापन 28 अक्टूबर को होगा|
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
