हमें अपने जीवन में सर्वप्रथम हिंसा का त्याग करना चाहिए सुवृतसागर महाराज
बीना
पूज्य मुनिश्री सुवृतसागर महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा कि पापों से बचने के लिए हमें नियम बनाना चाहिए। आने जाने के नियम आदि विषयों पर अगर हम नियम बना लेते हैं तो हम कितने ही पापों से बच सकते हैं। हम इस प्रकार का जितना त्याग कर पाते हैं तो हम मुनि जितना पुण्य संचय कर पाते हैं पुण्य के संचय से चारित्र की शिक्षा प्राप्त होती है।
हमें अपने जीवन को किस प्रकार जीना है इस पर विचार करना चाहिए। जीवन जीने के लिए सबसे पहले हिंसा का त्याग जरूर होना चाहिए। दो प्रकार की हिंसा बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि एक हिंसा बड़ी हिंसा होती है और एक हिंसा छोटी हिंसा होती है। छोटी हिंसा से बचा नहीं जा सकता लेकिन बड़ी हिंसा से बचा जा सकता है। बड़ी हिंसाओ का हमे त्याग करना चाहिए। जैन धर्म के ऊपर व जैन धर्म के व्यक्तियों के विषय में कहा कि जैन धर्म के व्यक्ति कभी हिंसा का विचार भी मन में नहीं लाते हैं। लेकिन उनका संकल्प के साथ हिंसा का त्याग नहीं होता है। इसलिए उन्हें इसका पाप अवश्य लगता है। यदि कोई व्यक्ति हिंसा का त्याग कर देता है तो किसी भी विपरीत प्रसंग आने पर वह कभी हत्या करने का विचार नहीं करेगा। महाराज श्री ने बड़ी हिंसा से बचने का संदेश दिया।
महाराज श्री ने जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा को बताते हुए कहा कि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतने भी साधक होते हैं वह सर्वप्रथम सदाचार एवं अहिंसा का पालन करते हैं। क्योंकि अहिंसा परमो धर्म है। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि हमारा जीवन भी आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज जैसा हो। लेकिन चाहने मात्र से नहीं होगा उनकी तरह हमें जीवन जीना होगा। उनके जैसे कार्य हमें करने होंगे। कहने मात्र से कुछ नहीं होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी
