क्षमा पर्व 30 सितम्बर पर विशेष आलेख

धर्म

क्षमा पर्व 30 सितम्बर पर विशेष आलेख
*मन की गाँठो को गूँथने की नही अपितु क्षमा पर्व पर खोलने की आवश्यकता है* संजय जैन बड़जात्या कामां
क्षमा एक भाव है जो की धारण किया जाता है वास्तविक रूप से क्षमा का अर्थ है स्वयं आगे बढ़कर क्षमादान करना ना कि क्षमा याचना करना। वैसे साधारण सी भाषा में विस्मृति को क्षमा से जोड़ा जाता है अर्थात यदि किसी ने आपके प्रति कोई गलती की है या आपने किसी के प्रति गलती की है तो उसे भुला देना अर्थात विस्मृत कर देना इस पर्व की महत्वपूर्णता है।

 

*क्षमा क्षमा सब करें क्षमा ना करे कोय* वर्तमान परिस्थितियों में क्षमा पर्व को भी हम केवल औपचारिक रूप से ही मनाते हैं। हम उन लोगों से क्षमा याचना करते हैं या उन लोगों को क्षमादान देते हैं। जिनसे हमारे मन मिले हुए हैं अर्थात जिन्हें हम स्नेह करते हैं और जिनके प्रति हमारी भावनाएं निर्मल हैं। किंतु उन लोगों को ना क्षमादान करते हैं और ना ही क्षमा याचना करते हैं जिनके प्रति हमारे मन में कटुता,

कलुषता,वैमनस्यता,कठोरता,ईर्ष्या विराजमान है। मन की गाँठो को गूँथने की नही अपितु क्षमा पर्व पर खोलने की आवश्यकता है।मन को निर्मल व पवित्र करते हुए बिल्कुल खाली कर देना ही क्षमा है यदि आप अपने मन को खाली ना करते हुए किसी के प्रति भरा हुआ रखते हैं अर्थात पूर्वाग्रहों से ग्रसित रहते हैं तो फिर क्षमा शब्द या इसका महत्व बेमानी हो जाता है। पुनः उन गलतियों का दोहरान करते हैं या फिर ह्रदय में वैमनस्यता धारण किये रहते हैं तो क्षमा का कोई औचित्य नही रह जाता है। जिस प्रकार दीपावली का पर्व घर की सफाई के लिए आता है उसी प्रकार वर्ष में क्षमा पर्व भी मन के मैल की सफाई के लिए आता है।

 


*ईर्ष्या का शूल दिल को कचोटता है*
*मतभेद मनभेद में जब बदलता है*
*मन मस्तिष्क में जब कोई खटकता है*
*करना क्षमा याचना तब परिणाम बदलता है*
क्षमावणी पर्व या ‘क्षमा दिवस’ दिगंबर जैन धर्मावलंबियों द्वारा मनाया जाने वाला एक खास पर्व है। इसे क्षमावाणी,क्षमापना या क्षमा पर्व भी कहते हैं। दिगंबर अनुयायियों द्वारा यह पर्व पवित्र भाद्र मास की समाप्ति पश्चात आश्विन मास कृष्ण पक्ष की एकम के दिन मनाया जाता हैं। श्वेतांबर इसे अपने आठ दिवसीय पर्यूषण पर्व के अंत में संवत्सरी के रूप में मनाते हैं इस पर सबसे अपने भूलों की क्षमा करते है!

         
भगवान महावीर द्वारा प्रदत्त *जिओ और जीने दो* का सिद्धांत भी यही कहता है कि दूसरों के प्रति करुणा रखते हुए उन्हें जीवन को सरल जीने का मार्ग प्रदान करो।
वैदिक ग्रंथों में भी क्षमा की श्रेष्ठता पर बल दिया गया है। जीवन का दीपक तो क्षमा मांग कर ही जलाया जा सकता है। अत: हमें अपने बड़े-बुजुर्गों, समाजजनों,पड़ोसीयों, मित्रों,रिश्तेदारों,सम्पर्क में आये सभी से क्षमा याचना करनी चाहिए।
हमें तन, मन और वचन से चोरी, हिंसा, व्याभिचार, ईर्ष्या, क्रोध, मान, छल, गाली, निंदा और झूठ इन दस दोषों से दूर रहना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि—————-
तमाम बुराई के बाद भी हम अपने आपको प्यार करना नहीं छोड़ते तो फिर दूसरे में कोई बात नापसंद होने पर भी उससे प्यार क्यों नहीं कर सकते?
सिख गुरु गोविंद सिंह एक जगह कहते हैं———- ‘
यदि कोई दुर्बल मनुष्य तुम्हारा अपमान करता है, तो उसे क्षमा कर दो, क्योंकि क्षमा करना वीरों का काम है।’
जैन धर्म में भी *क्षमा वीरस्य भूषणम्* अर्थात क्षमा को वीरों का आभूषण कहा गया है जो आपकी शरण में है या जो आपसे निर्बल है उसे क्षमा का दान दो। बीती ताहि बिसार दे अब आगे सुध ले अर्थात जो बीत चुका उसे भुलाकर आगे बढ़ जाना ही सही जीवन है।
अंत में इतना ही- ——–
क्षमा पर्व का पावन दिन है
भव्य भावना का त्योहार,
विगत वर्ष की सारी भूलें
देना हमारी आप बिसार।।
सबको क्षमा सबसे क्षमा
*संजय जैन बड़जात्या कामां,राष्ट्रीय प्रचार मंत्री धर्म जागृति संस्थान*

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