जब हुई थी ब्रह्मचारी रोहित भैया की मुनि दीक्षा तबसे जुड़ा संस्मरण
बीनाबारह
हम उस संस्मरण की बात कर रहे हैं जब ब्रह्मचारी रोहित भैया की मुनि दीक्षा होने जा रही थी जो बाद में आचार्य श्री से दीक्षित होकर मुनि श्री108 संधानसागर जी बने। रोहित भैया ने सभी शिक्षाएं मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज के सम्मुख रहकर प्राप्त की
यह संस्मरण ऐसा है जो गुरुदेव की महिमा को अलौकिक करता है यह पूज्य गुरुदेव सिर्फ संकेतों के द्वारा ही अपनी बात को कह देते हैं और बिना किसी विज्ञापन बिना किसी शोर-शराबे के अपना कार्य करते हैं। ऐसा ही उस समय हुआ प्रातःकालीन बेला का समय हुआ। ब्रह्मचारी रोहित भया जी आचार्य श्री विद्यासागर गुरुवर के दर्शनार्थ उनके कक्ष में गए। तब गुरुवर ने उनके सम्मुख देखा और मधुर मुस्कान दी। रोहित भैया का 1 दिन पहले उपवास था गुरुवर की स्मृति में यह बात थी। गुरुवर मुस्कुराए और उसी बात का जिक्र किया कहा कल उपवास था भया जी नम्र और विनत भावसे बोले हा, तो गुरुवर बोले आज और कर लो। रोहित भैया जी गुरुवर की वाणी को समझ नहीं पाए गुरुदेव संकेत दे रहे थे। फिर गुरुदेव मुस्कुराए पिच्छी दिखाकर कहां ये लेना आज वहा बैठे अन्य लोग इसे देख अचरज में पढ़ गए। पूज्य आचार्य श्री ने बिना किसी शोर-शराबे के बिना किसी विज्ञापन के दीक्षा की घोषणा कर दी। गुरु की महिमा बरनी ना जाए गुरु नाम जपो मन वचन काय
ऐसे गुरु को पाकर सारा विश्व गदगद और गोरवान्वित है। जब गुरुदेव ने दीक्षा दी थी तब गुरु पूर्णिमा का दिन था गुरु पूर्णिमा पर इससे अनोखी सोगात और गुरुवर अपने शिष्य को दे सकते थे।
आज वह मुनि श्री संथान सागर जी महाराज के रूप में विद्यमान है अपनी वाणी और धर्म साधना के द्वारा जिन धर्म की ध्वजा को शोभायमान कर रहे हैं। जो अपने आप में अलौकिक है।
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
