वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने आज उदयपुर हूमड़ भवन में केशलोचन किया ।
उदयपुर
वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज अपने संयम वर्ष का 55 वां चातुर्मास हूमड़ भवन तेलीवाड़ा में कर रहे हैं। आज अनेक श्रद्धालुओं के बीच आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अपना केशलोचन किया।
केशलोचन के बारे में संघ के मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 माह से 4 माह की अवधि के भीतर केशलोचन करना अनिवार्य है केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है । केश लोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है।

केश लोचन की प्रक्रिया में मुनि श्री ने बताया कि केश्लोचन करते समय केवल राख का उपयोग किया जाता है मुनि श्री ने बताया कि जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है बालों का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवो की उत्पत्ति होने की संभावना होती है जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं।

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बाल हाथों से इसलिए उखाड़े जाते हैं कि बालों को कटिंग करने के लिए सेविंग कराने के लिए अन्य द्रव्य की आवश्यकता होती है जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं बाल सौंदर्य का प्रतीक हैं इससे राग और आकर्षण होता है। केश लोच से शरीर से ममत्व दूर होता है केश लोचन के समय तप,संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं उस दिन उपवास करते हैं ।केश लोचन देखकर अनुमोदना करने से पुण्य की प्राप्ति होती है कर्मों की निर्जरा होती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
