मुनि श्री अजीत सागर महाराज का वर्षायोग कलश स्थापना समारोह संपन्न श्रमण संस्कृति हमारी पहचान है अजीत सागर महाराज
सागर
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के परम शिष्य अजीत सागर महाराज संघ का वर्षा योग कलश स्थापना समारोह 9 जुलाई को भाग्योदय तीर्थ सागर में संपन्न हुआ।
इस अवसर पर मुनि श्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि साधु-संत व मुनि जन आगम के बंधन से बंधे हुए होते हैं वे जनता से बंधे हुए नहीं होते हैं।पियूष वाणी से रसपान कराते हुए महाराज श्री ने कहा कि जिस प्रकार आकाश में जब बादल छाने लगते हैं तो मयूर का मन धरती पर फड़फड़ाने लगता है और वह नृत्य करने लग जाता है। जब बादल बरस जाते हैं तो धरती पर हरियाली सी छा जाती है।
यहां तक कि गिरगिट भी रंग बदल लेता है। उसी प्रकार चतुर्मास का संयोग जब भी आए तो मनुष्य को भी अपना रंग बदल लेना चाहिए और देव शास्त्र गुरु के प्रति समर्पित होना चाहिए।

महाराज श्री ने श्रमण संस्कृति को हमारी पहचान बताते हुए कहा कि चतुर्मास क्षण मुनियों के लिए आत्मा आराधना और श्रावक की आराधना का होता है। इसमें श्रावक दान और पूजा के द्वारा अपने मार्ग को प्रशस्त करता है। इस अवसर पर मुनि श्री निर्दोष सागर महाराज ने भी अपनी पीयूष वाणी से सभी को कृतार्थ किया और कहा कि ऐसा कार्य करना चाहिए कि रात में सुख की नींद ले सको, अपनी प्रथम अवस्था में ऐसे कार्य करना जिससे वृद्धावस्था सुख से व्यतीत हो सके। चातुर्मास के 4 माह को सुख से व्यतीत करो। एवं उन्होंने संतो के चरणों के प्रति बताते हुए कहा कि इनके चरणों में आने पर दरिद्रता दूर हो जाती है। एक उदाहरण के द्वारा महाराज श्री ने कहा कि अंजलि में रखा पानी ठहरता नहीं है लेकिन संत के पास जाने थे मानव के आप दूर हो जाते हैं। जिनके भी पाप कर्म उदित हैं वह मुनियों के पास नहीं आ सकते। यदि वे आ भी जाते हैं संत बने या ना बने लेकिन संतोषी अवश्य बने सकते हैं। सभी को उद्घोष करते हुए कहा कि बिगुल बजा दो, नींद तोड़ दो। उन्होंने ज्ञान के विषय में कहा कि ज्ञान की जड़ हमेशा कड़वी ही होगी लेकिन इसका फल मीठा ही प्राप्त होता है हम सरकार को टैक्स नियमित रूप से देते हैं उसी प्रकार हमें दान भी नियमित रूप से देते रहना चाहिए।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
