आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के 34 वे आचार्य पदारोहण दिवस दिवस पर भाव भीनी विनयाजली
श्रीशांतिवीरशिवधर्माजीतवर्धमानसुरीभ्यो नमः॥
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का 34 वा आचार्य पदारोहण
दिवस मना रहे है।
आओ शांति मार्ग पर चले..
20 वी सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री 108 शांति सागर महाराजकी अक्षुण्ण पट्ट परम्परा में तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी महाराज से दीक्षित मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश राष्ट्र गौरव वात्सल्य वारिधि तपोनिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराजको त्रिकाल नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु निवेदित करते है।
भरत चक्रवती के नाम पर अवतरित भारत देश मे राज्य मध्यप्रदेश में कई भव्य आत्माओं ने अवतरित होकर श्रमण मार्ग अपनाया है ।
इसी राज्य के खरगौन जिले के सनावद नगर जो कि सिद्ध क्षेत्र श्री सिद्धवरकूट, श्री सिद्धक्षेत्र पावागिरी ऊन, श्री सिद्ध क्षेत्र चूलगिरी बावनगजा बड़वानी के निकट है।
इन सिद्ध क्षेत्रों से करोड़ो मुनि मोक्ष गए है।

प्रातः स्मरणीय प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती परमपूज्य 108 आचार्य श्री शांतिसागर महाराज गुरुदेव की अक्षुण्ण पट्ट परम्परा में तृतीय पट्टा धीश आचार्य श्री धर्मसागर महाराज से दीक्षित जिनधर्म प्रभावक राष्ट्र गौरव
पंचम पट्टाधीश वात्सलय वारिधि
108 आचार्य श्री वर्द्धमान सागर महाराज सहित 17 साधुओं ब्रह्मचारी ब्रह्मचारिणी अनेक प्रतिमा धारी की गौरवशाली जन्म भूमि कर्म भूमि समाधि भूमि ऐसी पवित्र धर्म नगरी सनावद में पर्युषण पर्व के तृतीय उत्तम आर्जव दिवस पर एक प्रतिभाशाली कुल परिवार नगर का मान बढ़ाने वाले यशस्वी बालक यशवंत का जन्म माता श्रीमती मनोरमा देवी जैन की उज्जवल कोख से प्रसवित हुआ। इनके पिता श्री कमलचंद जैन उपजाति पोरवाड़ रहे।

18 सितम्बर 1950 भाद्रपद शुक्ल सप्तमी संवत 2006 को अवतरित होनहार भाग्यशाली सौभाग्यशाली पुत्र के पूर्व 8 पुत्र 4 पुत्रियां असमय काल का ग्रास हुई । जब इनकी उम्र मात्र 12 वर्ष की थी तब इनकी माता जी का असामायिक निधन हो गया ।

आपने सन 1964 में श्री बावनगजा बड़वानी में आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज और आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी महाराज के दर्शन किये ।
सन 1964 में तृतीय पट्टाधीश आचार्य
श्री धर्म सागर जी महाराज के सनावद में मुनि अवस्था के दर्शन किये ।सन 1965 में आर्यिका श्री इंदुमती माताजी का सनावद चातुर्मास हुआ । ओर सन 1967 में आर्यिका 105 श्री ज्ञानमति माताजी का सनावद चातुर्मास हुआ ।
*व्रत नियम*
सन 1967 में श्री मुक्तागिर सिद्ध क्षेत्र में गाणिनी आर्यिका 105श्री ज्ञानमति माताजी से *आजीवन शूद्र जल* त्याग और 5 वर्ष का *ब्रह्मचर्य व्रत* लिया ।
जनवरी 1968 बागीदौरा राजस्थान में आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज से *आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया।
जब ग्राम करावली में सर्व प्रथम आचार्य श्री शिव सागर जी के दर्शन किये । सनावद वासियो के साथ श्री गिरनार जी एवम बुंदेलखंड की तीर्थ यात्रा कर। बालक यशवंत वापस सनावद आ गए ।सन 1968 को श्री यशवंत पुनः ग्राम पालोदा में आचार्य श्री शिव सागर जी के दर्शन हेतु गए
*गृह त्याग*

मई 1968 से आप संघ में शामिल हो गए । भीमपुर जिला डूंगरपुर में आपने द्वितीय पट्टाधीशआचार्य श्री 108 शिव सागर जी महाराज से *गृह त्याग* का नियम लिया ।
*दीक्षा हेतु श्रीफल भेंट*
बाल ब्रह्मचारी श्री यशवंत जी ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में फागुन कृष्णा चतुर्दशी संवत 2025 सन 1969 को *श्री महावीर जी मे आचार्य श्री शिव सागर जी महाराज* को मुनि दीक्षा हेतु श्रीफल चढ़ा कर निवेदन किया ।
गुरुदेव के आदेश से अगले दिन श्री सम्मेदशिखर जी की यात्रा पर गए। आचार्य श्री 108शिव सागर जी महाराज की अनायास *समाधि फागुन कृष्णा 30 संवत 2025* को श्री महावीर जी मे होने के कारण पुनः नूतन आचार्य तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी महाराज को दीक्षा हेतु श्रीफल भेंट किया ।
*मुनि दीक्षा*
तृतीय पट्टाधीश नूतन आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी महाराज ने श्री महावीर जी मे *फागुन शुक्ला 8 संवत 2025* 24 फरवरी 1969 को 6 मुनि 3 आर्यिका तथा 2 क्षुल्लक कुल 11 दीक्षाएं आपके सहित दी ।
अब ब्रह्मचारी श्री यशवन्त मुनि दीक्षा धारण कर *मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज*बन गए ।
*उपसर्ग*
*नेत्र ज्योति जाना*
श्री महावीर जी से आचार्य श्री 108धर्म सागर जी महाराज का विहार जयपुर खानिया जी हुआ ज्येष्ठ शुक्ला 5 पंचमी संवत 2025 सन 1969 को अनायास नव दीक्षित मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज की नेत्रों की रोशनी चली जाती है उस समय उम्र मात्र 19 वर्ष की उसी समय डॉक्टर बुलाये गए अगले दिन डॉक्टरों ने नेत्रों का परीक्षण किया। डॉक्टरों ने परामर्श दिया कि बिना इंजेक्शन लगाए नेत्र ज्योति आना नामुमकिन है।
संघ में विचार विमर्श होने लगा कि मात्र 19 वर्ष की उम्र में इतना उपसर्ग क्या किया जावेदीक्षा छेद कर डॉक्टरी इलाज कराने की भी चर्चा चली ।
मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज के कानों में चर्चा पहुँचने पर उनहोंने कहा कि में इंजेक्शन नही लगवायेगे प्रसंग आने पर समाधि ले लेंगे ।
मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज ने 49 घंटे के बाद 1008 श्री चंद्रप्रभु की वेदी पर मस्तक रख कर पूज्य पाद रचित *श्री शांति भक्ति का पाठ स्तुति* प्रारम्भ की ।लगातार 3 घंटे तक प्रभु भक्ति करने के बाद अर्थात *52 घण्टे बाद* प्रभु भक्ति के प्रभाव से बिना डॉक्टरी इलाज के *नेत्र ज्योति वापस* आ जाती है ।
उस घटना के समय आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी सहित 17 मुनि 25 आर्यिकाये 4 क्षुल्लक एवम 1 क्षुल्लिका सहित 47 साधु विराजित थे।
परमपूज्य आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी जी आकाश गमनी विद्या से आकाश में गमन कर रहे थे सूर्य की प्रचंड तेज रोशनी से आचार्य श्री की नेत्र ज्योति जाने पर श्री पूज्य पाद स्वामी ने श्री शांति भक्ति की रचना कर नेत्र ज्योति वापस पाई थी ।उसी पवित्र शांति भक्ति के पाठ से परम पूज्य मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की नेत्र ज्योति वापस आई ।
इन पवित्र नेत्रों से जब गुरुदेव का वात्सल्य मयी आशीर्वाद मिलता है तो भक्तों का मानव जीवन सफल हो जाता है।
*आचार्य पद*
*चारित्र चक्रवती प्रथमचार्य श्री 108 शांति सागर जी महाराज की अक्षुण्ण पट्टपरम्परा के *चतुर्थ पट्टाचार्य श्री 108 अजित सागर जी महाराज के *पत्र के माध्यम से लिखित आदेश* अनुसार *पारसोला राजस्थान में 24 जून 1990 आषाढ़ सुदी दूज* को आचार्य पद गुरु आदेश अनुसार दिया गया।

वर्ष 1969 से वर्ष 2022 तक विभिन्न तीर्थ क्षेत्रो अतिशय क्षेत्रो प्रदेश राजधानियों महानगरों सिद्ध क्षेत्रो निर्वाण भूमियों आदि में चातुर्मास किये। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी गुरुदेव ने अभी तक 105 दीक्षाये दी है । मुनि दीक्षा 36 आर्यिकाये दीक्षा 41ऐलक दीक्षा 01 क्षुल्लक दीक्षा 14 क्षुल्लिका 13 परंपरा के पंचम
पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108
आचार्य श्री 108 वर्द्धमान सागर जी ने 12 राज्यों राजस्थान दिल्ली हरियाणा उत्तर प्रदेश गुजरात कर्नाटक तमिलनाडु झारखंड बिहार बंगाल एवम मध्यप्रदेश में सिद्ध क्षेत्र,अतिशय क्षेत्र में किए है।
परंपरा के सभी आचार्यों द्वारा उदयपुर में चातुर्मास
आचार्य श्री शांति सागर जी ने सन 1934 में आचार्य श्री वीर सागर जी ने सन 1934 मुनि अवस्था में आचार्य श्री शिव सागर जी ने सन 1967 में आचार्य श्री धर्म सागर जी ने सन 1978 में आचार्य श्री अजीत सागर जी ने सन 1987 में
आचार्य पद भी यहीं मिला
वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने भी उदयपुर में वर्ष 2002 में चातुर्मास किया।
आचार्य श्री और उदयपुर
वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उदयपुर में चौथी बार प्रवेश किया है। सबसे पहले फरवरी 1992 में अशोक नगर आयड तथा अन्य उप नगरों उदयपुर में प्रवेश किया ।20 फरवरी 1992 को उदयपुर से गुजरात यात्रा के लिए विहार किया ।
इसके बाद 26 मई 1996 को सेक्टर 11 श्री आदिनाथ मंदिर में पंचकल्याणक हेतु आप संघ सहित उदयपुर पधारे ।17 जुलाई 1996 को आचार्य पदारोहण उदयपुर में मनाया गया ।1 जुलाई 2002 को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का पुनः उदयपुर आगमन हुआ। 12 जुलाई 2002 को आचार्य पदारोहण हूमड़ भवन में मनाया गया ।तथा चातुर्मास कलश स्थापना सर्व ऋतु विलास मंदिर जी में की। आचार्य श्री के सानिध्य में गुरु मंदिर का निर्माण कर शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्रुतसागर जी ग्रन्थालय की स्थापना की गई ।18 दिसंबर 2002 के बाद उदयपुर से बिहार हुआ। वर्ष 2023 में 2 अप्रैल को उदयपुर के इतिहास में भव्य मंगल प्रवेश हुआ ।आपके सानिध्य में महावीर जयंती मनाई गई ।उदयपुर के संपूर्ण नगर के सभी धर्म समाज द्वारा नागरिक अभिनंदन कर आचार्य शिरोमणि की उपाधि से आपको अलंकृत किया गया।
वर्ष 2023 में आचार्य श्री ने सर्व ऋतु विलास में तथा सेक्टर 11 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा भव्य रुप से संपन्न कराई
दीक्षा
सर्व ऋतु विलास में रेनवाल किशनगढ़ शशिकांत पाटनी को 17 अप्रैल 2023 को दीक्षा दी गई ।आपका नाम क्षुल्लक श्री सर्वार्थ सागर रखा गया ।इसी दिन आप की समाधि भी हो गई। दिनांक 15 मई 2023 को क्षुल्लिका श्री शांतमति को आर्यिका दीक्षा सेक्टर 11 संत भवन में दी गई ।आपका नूतन नाम आर्यिका श्री सुभगमति किया गया।
उदयपुर के नगर गौरव
वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा अभी तक कुल 105 दीक्षाएं दी गई है ।उसमें उदयपुर या निकटवर्ती नगरों के परिजन जो वर्तमान में उदयपुर निवास कर रहे हैं उन परिवार के जो साधु बने हैं वह निम्नानुसार हैं
मुनि श्री ओम सागर जी, मुनि श्री चिन्मय सागर जी ,मुनि श्री देवप्रभ सागर जी ,मुनि श्री देवकांत सागर जी, मुनि श्री प्रशम सागर जी, मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी ,आर्यिका श्री मुदित मति जी, आरिका श्री शांत मति जी, श्री प्रणतमति जी ,श्री संकल्प मति जी। इसके अतिरिक्त उदयपुर के अनेक भव्य प्राणियों को आचार्य श्री शिव सागर जी एवं आचार्य श्री धर्म सागर जी ने दीक्षा दी है।
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
