सत्मार्ग पर चलने के साथ सत्संगति की भी आवश्यकता पड़ती है आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
| डोंगरगढ़
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि आचार्यों के द्वारा शास्त्रों के माध्यम से हमें मोक्षमार्ग के बारे में एवं उसमे चलने कि विधि और उसे पाने के लिए अथक पुरुषार्थ के बारे में बताया है।
उन्होंने कहा इस मार्ग में दूरी तो बहुत है परंतु लक्ष्य प्राप्ति के लिए उत्साह पूर्वक एक-एक कदम उसी ओर चल रहे हैं और कभी न कभी तो लक्ष्य जाएगा। सत्मार्ग में चलने साथ-साथ सत्संगति की आवश्यकता पड़ती है। जैसी होगी संगति वैसी होगी गति। हमें गुणी जनों की संगती में तब तक रहना
चाहिए जब तक प्रभु से साक्षात्कार न हो जाए। उन्होंने कहा कि हमें आर्यों कीसंगती करनी चाहिए क्योंकि वे गुणी होने के साथ-साथ दूसरों के गुणों को भी उद्घाटित कर देते है। आर्य हमेशा आर्य खंड में ही होते है, हमें हमेशा हित, मित और मिष्ठ वचन बोलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हित से आशय ऐसे वचन बोलना जिससे स्वयं
का और दूसरों का भी हित हो और किसी का अहित ना हो, मित
से आशय जितना आवश्यक उतना बोलना है, ज्यादा नहीं
बोलना चाहिए, मिष्ठ से मिठाई जो आप लोगों को बहुत पसंद
हो। यहां इससे आशय है किहमें हमेशा प्रिय एवं मीठा बोलना
चाहिए जिससे बोलने वाले कोऔर उसे सुनने वाले दोनों को
अच्छा लगे।

जिन देव जिन्होंने स्वयं को जीत लिया अपनी इन्द्रियों को जीता और मोक्ष मार्गसे मोक्ष पा सकते हैं।आचार्यों ने कहा कि महापुरुषों के जीवन चरित्र को पढ़कर हमारा उत्साहहमेशा सत्मार्ग की ओर बढ़ता है औरऐ से ही उत्साह पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर चलने से लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर महाराज को आहार दान का सौभाग्य श्रीमान निर्मल कुमार काला जैन परिवार चांद जी की खेड़ी वालो को प्राप्त हुआ है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
