उत्कृष्ठ सागर महाराज की वीर, विशाल, धवल रत्नत्रय रूपी सन्निधि में हो रही है उत्कृष्ट तप साधना

धर्म

उत्कृष्ठ सागर महाराज की वीर, विशाल, धवल रत्नत्रय रूपी सन्निधि में हो रही है उत्कृष्ट तप साधना

हिंगोली महाराष्ट्र
जिस उम्र में इंद्रियां शिथिल से हो जाती हैं, एवं यह शरीर बिस्तर की राह को पकड़ लेता है। तब व्यक्ति असहाय हो जाता है।

लेकिन ऐसी उम्र में 82 वर्ष में एक उत्कृष्ट साधक निरंतर अपनी साधना को मोक्ष महल की सीढ़ी पर चढ़ता जा रहा।

यह उनका विवरण दिया जा रहा है जो निर्यापक श्रमण श्री वीर सागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री उत्कृष्ट सागर जी महाराज की जिनकी यथा नाम तथा गुण साथ उत्कृष्ट साधना पूज्य वीर सागर जी महाराज के सन्निधि में निर्बाध रूप से चल रही है।

 

 

 

 

यदि हम इस पर गौर करें तो मुनि श्री विशाल सागर जी मुनि श्री धवल सागर जी , क्षुल्लक श्री मंथन सागर जी ,क्षुल्लक श्री मनन सागर जी , क्षुल्लक श्री विचार सागर जी ,क्षुल्लक श्री मगन सागर जी ,क्षुल्लक श्री विरल सागर जी निरंतर ,नवदीक्षित मुनि महाराज की कुशलता के साथ वैयावृति कर मोक्षमार्ग में सहयोगी बन रहे है। जो अपने आप में अनुपम है।

 

 

 

 

यह सभी भली भांति जानते हैं कि आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज, निर्यापक श्रमण श्री समय सागर जी महाराज ,निर्यापक श्रमण श्री योगसागर जी महाराज के गृहस्थ अवस्था के अग्रज महावीर भैया जी सम्प्रति मुनि श्री उत्कृष्ट सागर जी महाराज को निरंतर निर्यापक श्रमण श्री वीरसागर जी महाराज अहर्निश तत्परता के साथ मूलगुण पालन , स्वाध्याय,प्रतिक्रमण आदि में पुरुषार्थ पूर्वक कार्य करते है,

 

यह अपने आप में एक अनुपम उदाहरण देता है कि सुबह की सामायिक से लेकर रात की सामायिक तक निर्यापक श्रमण अथक परिश्रम करते है। एवम समस्त संघ आहार आदि में निरंतर सेवा करता है।

वहा से मिली जानकारी जो अपने आप में यह बताती है कि साधना तप की क्या अनुपम महिमा है जब सामायिक होती है। तब सामायिक भी नवदीक्षित मुनिराज निर्यापक श्रमण की तरह खड़े होकर ही करते है । यही है आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के गुरुकुल की शिष्य मंडली का प्रभाव है। जो पंचम युग में चतुर्थ युग की चर्या का उदाहरण हमें देता है। क्या खूब लिखा है कलयुग में सतयुग के जैसी शिष्य मंडली प्यारी। गुण रत्नाकर विद्यासागर।

 

शुद्ध जैन भोजन के साथ यात्रा

 

शुद्ध जैन भोजन के साथ यात्रा

 

 

 

 

धन्य है निर्यापक श्रमण जिन्हें गुरुदेव ने अपनी टकशाला में इस तरह ढाला है कि वह निरंतर आत्म कल्याण के साथ सभी के कल्याण में संलग्न है ,और धन्य है नवदीक्षित मुनिराज जो अपने गृहस्थ अवस्था के अनुज एवं अग्रज मुनिराजो के पथ का अनुशरण कर रहे है।
धन्य है युग श्रेष्ठ गुरुदेव
धन्य है निर्यापक श्रमण श्री वीर सागर जी महाराज
धन्य है मुनि उत्कृष्ट सागर जी महाराज
धन्य है सदलगा की माटी और धन्य है अष्टगे परिवार

शुभांशु जैन शहपुरा से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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