जब तक शारीरिक मानसिक और हार्दिक क्षमता हमारे अंदर है भविष्य को निर्मित करने का भाव रखना चाहिए समयसागर महाराज

धर्म

जब तक शारीरिक मानसिक और हार्दिक क्षमता हमारे अंदर है भविष्य को निर्मित करने का भाव रखना चाहिए समयसागर महाराज
पजनारी
निर्यापक श्रमण समय सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब तक शारीरिक मानसिक आर्थिक क्षमता हमारे अंदर है तब तक भविष्य को निर्मित करने का भाव रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी सद्गति एवं दुर्गति किसी दूसरे के द्वारा नहीं अपने परिणामों पर ही निर्भर करती है। परिणामों को भी सुरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि आज हमे साधन मिल रहा है। वहां भविष्य में भी उपलब्ध हो यह जरूरी नहीं है। इसीलिए प्रवचन के माध्यम से जो भी आपने सुना है उसे आचरण में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए।

उन्होंने साधकों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि साधकों का ध्यान किसी भी घड़ी में अन्यत्र नहीं जाता। अर्थ बताते हुए कहा कि अन्यत्र नहीं जाने का अर्थ बहुत गहरा है उनकी व्यक्ति किसी भी वस्तु की ओर जाती है तो वह उसमें विषमता का अनुभव नहीं करते। धूप आ जाए यात्री जाए तो भी वह उसी स्थिति में रहते हैं। प्रतिकार का भाव किए बिना भी धर्म ध्यान किया जा सकता है। रूस में तो आती जाती रहती हैं। किंतु पुण्य कर्म के उदय से मोक्ष पथ पर चलने में सहायक यह जो शरीर है व प्राप्त होने के उपरांत छूट जाए और पुणे प्राप्त हो जाए यह कहा नहीं जा सकता। वर्तमान के माध्यम से ही भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।

 

 

 

किंतु संसारी प्राणी आसक्ति का भाव रखता है वह वर्तमान में नहीं पाता। भविष्य में भी मुझे भी इसी प्रकार की भोग सामग्री प्राप्त हो यह विकल्प उसके मन में चलता रहता है। महाराज जी ने कहा इसीलिए आचार्य श्री कहते हैं यदि वर्तमान में आपका उपयोग धर्म में लगा हुआ है देव शास्त्र गुरु की भक्ति में मन लगा है तो आपका भविष्य निश्चित ही सुरक्षित होता जाता है इसीलिए संतोष का अनुभव करना चाहिए वर्तमान में जो समय मिला है उसको अधिकतम धर्म में लगाना चाहिए परंतु आजकल इसका उल्टा हो रहा है अधिकतम समय व्यक्ति सांसारिक कार्यों में लगा रहा है प्रत्येक कार्य क्षेत्र में व्यक्ति स्वतंत्र है तो धार्मिक क्षेत्र में परतंत्रता क्यों अनुभव करते हो। आयु जो निकलती चली जा रही है वह फिर लौट कर आने वाली नहीं है। प्राणी बाल्यावस्था शिशु युवा प्रौढ़ावस्था से फिर वृद्धावस्था तक पहुंच जाता है जब तक स्वास्थ्य अच्छा है में शिथिलता नहीं आई है, तभी ही धर्म कर लेना चाहिए अन्यथा वृद्धावस्था में आप कुछ नहीं कर पाएंगे। क्योंकि उत्साह समाप्त होता चला जाता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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