संयम के पालन और परिणामो में विशुद्ध ता आने पर संसार परिभ्रमण से छुटकारा मिलेगाआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
महावीर जी
अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी मै
वात्सल्य वारिधिआचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित विराजित है। गजू भैया राजेश पंचोलिया इंदौर ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा 2 नवंबर को दीक्षित आर्यिका श्री शील मति जी एवम आर्यिका श्री संकल्प मति जी ने विगत दिनों संस्तरारोहन विगत दिनों कर नियम सल्लेखना में आहार उपवास का क्रम जारी है आर्यिका श्री संकल्प मति जी केवल जल ही ले रही हैं ,वही आर्यिका श्री शील मति माताजी के अष्टाहनिका पर्व में 8 उपवास चल रहे हैं उल्लेखनीय हैं कि 75 वर्षीय आर्यिका श्री शील मति माताजी ने 4 अगस्त 2022 को पहले क्षुल्लिका दीक्षा ली है ,तब से अभी तक विगत दिनों में 50 से अधिक उपवास कर लिए हैं ।आप भी वर्तमान में केवल पानी तथा मुनक्का का पानी छोड़कर शेष पदार्थो का त्याग कर दिया हैं।
वर्तमान में नियम सल्लेखना चल रही है वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी तथा संघस्थ मुनि श्री हितेंद्र सागर जी तथा अन्य साधु तथा संघस्थ आर्यिका माताजी द्वारा प्रतिदिन दोनो क्षपकोत्तमा माताजी को संबोधित किया जाता है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने संबोधन कर बताया इस संसार में परिभ्रमण का कारण समझना होगा वर्तमान में लौकिक जीवन में कोई व्यापार करने के कारण कोई पढ़ाई करने के कारण कोईनौकरी में ट्रांसफर होने के कारण एक नगर से दूसरे नगर में जाता है
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वह कारण लौकिक जीवन में आप समझते हैं किंतु आपका एक भव से दूसरे भव में ,एक पर्याय से दूसरे पर्याय में क्यों परिभ्रमण हो रहा है , इस कारण को समझने का प्रयास नहीं किया ,किस कारण से आप कभी मनुष्य गति में ,कभी देव गति में ,कभी निगोद गति में ,कभी नरक गति में, कभी तिर्यच गति में परिभ्रमण कर रहे हैं ।जब तक इन कारणों को नहीं समझेंगे तब तक संसार में परिभ्रमण करते रहेंगे। हमारे द्वारा जो कर्म किए जाते हैं वही संसार परिभ्रमण का कारण है। कर्म का बंधन भी हमारी अपनी भूल के कारण होता है ,क्योंकि हमने मूल को नहीं समझा। मूल को समझेंगे तो हमसे भूल नहीं होगी ।और संसार परिभ्रमण नहीं होगा कर्मों के उदय के कारण हम संसार में परिभ्रमण करते हैं ,और परिभ्रमण कब तक करना है इस पर भी चिंतन करना होगा ।कभी नौकरी में ट्रांसफर होता तो कहते हैं कालापानी भेज दिया अर्थात खराब जगह भेज दिया, संसार परिभ्रमण में भी आप कभी नरक गति जाते हो कभी निगोद में जाते हो कभी तिर्यंच में जाते हो अब कौन सी गति या पर्याय रह गई जिसमें आपने अभी तक परिभ्रमण नहीं किया है।

इसलिए संयम ही ऐसा मार्ग है जिससे आप संसार परिभ्रमण से छुटकारा पा सकते हैं । संयम परिपालन के साथ परिणामों में विशुद्धि भी जरूरी है तभी हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
