प्रेम आत्मा की एक निधि है जिसकी हर प्राणी को चाहत होती है: निष्पक्षसागर  

धर्म

प्रेम आत्मा की एक निधि है जिसकी हर प्राणी को चाहत होती है: निष्पक्षसागर
भगवान आदिनाथ का महामस्तिकाभिषेक, अष्टद्रव्य के अर्ध्य समर्पित किए
| खुरई
शुक्रवार को प्राचीन जैन मंदिरमें नवीन वेदी पर विराजमान700 साल प्राचीन अतिशयकारीमूलनायक प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री
आदिनाथ का महामस्तिकाभिषेकसंपन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने प्रथम
अभिषेक, शांतिधारा कर पुण्यार्जनकिया। उसके बाद निर्यापक मुनिश्रीसंभव सागर महाराज जी के ससंघसानिध्य में श्रद्धालुओं ने अभिषेककर भगवान आदिनाथ का सामूहिक पूजन किया

 

 

भक्ताम्बर विधान काआयोजन किया गया। इस अवसरपर मुनिश्री निष्पक्षसागर महाराज नेकहा कि संवेदना आत्मा की एक निधि है। वैसे ही प्रेम आत्मा कीएक निधि है, जिसकी हर प्राणी को चाहत  होती है।मधुमक्खियां समूह में रहती हैं।चीटियां लाइन से चलती है। पशुपक्षी नर-मादा जोड़ा साथ रहकरजीवन गुजारते हैं। यदि हम इंसान कीबात करें तो उसका चलायमान होताहै। प्रेम आत्मा का प्रकाश है जैसेसूर्य उदय होते ही अंधकार गायबहो जाता है, वैसे ही वास्तविक प्रेमका उदय होते ही नफरत, अज्ञानता गायब हो जाती है।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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