पुत्र सुपुत्र होना चाहिए ब्रह्मचारी प्रदीप भैया
खुरई
बुधवार की पावन बेला मे प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर मे निर्यापक श्रमण संभवसागर महाराज संघ सानिध्य एवम बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश के कुशल मार्गदर्शन मे मे वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव शुरू हुआ इसके प्रथम दिवस यागमंडल विधान सम्पन्न हुआ जिसमे सभी इन्द्र इंद्राणियों ने भक्ति भाव के साथ किया गया इससे पूर्व श्रीजी की शोभायात्रा निकाली गयी गुरुवार की बेला मे 700 वर्ष प्राचीन प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान् की प्रतिमा स्वर्ण रजत एवम हीरा जडित नवीन वेदी पर विराजमान किया जाएगा
वही बुधवार की बेला मे प्रदीप भया ने कहा की चंद्रमा से रात्रि, संत से जीवन औरशील से नारी शोभायमान होती है।
जो संस्कार बाल्यावस्था में दिए जातेहैं वे अंत समय तक चलते है। जोसंस्कार गर्भ में दिए जाते हैं वे अगले भव तक चलते हैं। सद्पुरुषार्थशीलबेटे के पीछे गुण अपने आप, तनकी छाया के समान साथ चले आतेहैं। पुरूषार्थ की शिक्षा मधुमक्खी से लेनी चाहिए। पुत्र सुपुत्र होना चाहिए।जो सतकार्य करें, माता-पिता कीकीर्ति बढ़ाए। कुल को पवित्र रखें,कुल की रक्षा करें माता-पिता कीप्रतिष्ठा में आंच न आने दे, चन्द्रमाके समान निर्मल, स्वच्छ विचारवाला पुत्र ही सुपुत्र कहलाता है।
उन्होने कहा किसी कवि ने लिखा है कुल कपूत और दीप की गति, एक कर जोए ।बारे उज्यारे लगे, बुझे अंधेरा होय।।कुपुत्र और दीपक की गति समानहोती है दीपक जलने पर उजाला करता है और बुझने पर अंधेरा। इसीप्रकार कुपुत्र बाल अवस्था में बड़ाअच्छा लगता है किंतु बड़े होने परआचरणहीन होने से अंधेरा करताहै। याद रहे कि पूर्व संस्कार के
अनुसार एवं कर्मों के अनुसार सुपुत्रएवं कुपुत्र जन्म लेते है। उन्होंने कहाकि सुपुत्र से कुल, राजा से पृथ्वी,उन्होंने कहा कि परिणामतःआज का बालक कल का श्रावक,परसों का संत और तरसों का भगवंतहोता है। श्रेष्ठ श्रावक ही आगेचलकर संत बनता है। अपनी चर्या,तपस्या पर चलकर भगवान पद कोधारण करता है। वर्तमान युग मंत्र-तंत्र और राजतंत्र का नहीं है, बल्कि, लोकतंत्र का है। यह बनाने का काम कम, मिटाने का ज्यादा करता है।इस युग के बेटों ने, भौतिकता की चकाचौंध और यंत्रों के प्रयोग सेपृथ्वी को तो उजाड़ ही दिया है औरपर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है।इसके बाद यह चंद्र और मंगल ग्रहोंको भी उजाड़ने में लगा है।
संकलन अभिषेकं जैन लूहाडीया रामगंजमंडी
