तीर्थों के दर्शन करने यात्रा करनी पड़ती है,तीर्थ बनने के लिए स्वयं में रहना पड़ता है : आचार्यश्री विशुद्ध सागर महाराज
रायपुर।
यदि मुस्कुराकर जीवन जीना है तो आज का प्रवचन बहुत ध्यान से सुनिए कि जो अपनी वस्तु होती है उसे पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ता है, पर वस्तु को पीछे मुड़कर देखना पड़ता है।

ज्ञानियों निज वस्तु के लिए आंखे ही नहीं खोलनी पड़ती है, आंखे तो बंद रहती है,फिर जो है सो है। भगवान के दर्शन करना है तो मंदिर जाना पड़ेगा, तीर्थों के दर्शन करना है तो यात्रा कर तीर्थ जाना पड़ेगा परंतु तीर्थ बनने के लिए कहीं नहीं जाना पड़ेगा,स्वयं में ही रहना पड़ता है। यह उपदेश सन्मति नगर फाफाडीह में ससंघ विराजित आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने रविवार को अपनी विशेष चतुर्मासिक प्रवचन माला में दिया।

आचार्यश्री ने कहा कि ज्ञानियों मल अप्रयोगी है, लेकिन सूअर के लिए प्रयोगी है, इसलिए क्या सुंदर है,क्या असुंदर है यह विकल्प छोड़ दीजिए,जिसको जो अच्छा लगता है उसके लिए वही सुंदर है और जिसको जो अच्छा नहीं लगता है उसके लिए वह असुंदर है।
जिसमें क्षमता और योग्यता नहीं है तो उसे निपनिया (बगैर पानी मिला) दूध मत पिलाना, क्योंकि उसे पचेगा नहीं। किसी को दूध सुख देता है तो किसी को दूध दुख देता है,ऐसे ही मित्र शुद्ध वीतरागी धर्म मिथ्या दृष्टियों को दुख देता है।

आचार्यश्री ने कहा कि असमर्थजनों से मार्ग दूषित होता है,जो समर्थवान नहीं वो गाय का शुद्ध निपनियादूध को क्या पचा पाएंगे। शुद्ध दूध पचाने के लिए जन्म से शुद्ध दूध पीना पड़ेगा। ज्ञानियों शुद्ध दूध से असमर्थ लोगों का पेट दर्द करता है, ऐसे ही मिथ्या दृष्टि असमर्थ प्राणी का वीतराग धर्म को सुनकर पेट दर्द करता है। हमारे धर्म का दोष नहीं है,असमर्थ की शक्ति का दोष है, इसलिए नीति को समझो ज्ञानियों कि असमर्थ लोगों को उत्कृष्ट वस्तु ही नहीं दिखाना चाहिए। मैंने भी आपको यहां पहले समर्थ बनाया ,फिर आज इतने दिनों बाद ये कठिन प्रवचन किया। प्रथम दिन जब मैं नगर में प्रवेश किया था, यदि उस दिन यह कठिन प्रवचन करता तो समझ नहीं आता, लेकिन अब आप समर्थवान हो गए हो,अब मैं कितने भी कठिन प्रवचन करूं आपको समझ में आते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि एक भी इंद्रिय स्वयं को विषय नहीं बनाती और आप लोग इतने मद में उन्मत हो,कहते हो कि मेरे घर में यह है,वह है,मेरे पास इतना है,ज्ञानियों किस पर इठला
रहे हो ? जो आपकी वस्तु ही नहीं, फिर वस्तुत्व कैसा ? व्यक्ति इठलाता नहीं रोता भी है,लोग कहते हैं मेरे पास यह नहीं है, वह नहीं है, घर नहीं है,अरे मित्रों आप लोग रो किसके लिए रहे हो ? जो आपकी संपत्ति नहीं है,उसे अपनी बनाने के चक्कर में हो, इसलिए रोना पड़ रहा है। आज तक जितने चोर लुटेरे हुए हैं,जितने हंसने रोने वाले हुए हैं, वे बिचारे अज्ञानी मूढ़ प्राणी हैं,उन्हें बोध ही नहीं है,बिचारे उस पर रो रहे हैं जो आपकी वस्तु ही नहीं है।
आचार्यश्री ने कहा कि आपके अंदर भेद है,आपके अंदर अभेद है और भेदभेदात्मक वस्तु का जो अस्तित्व है, इसे जाने बिना आप न व्यवहार धर्म का पालन कर सकते हो,न निश्चय धर्म का पालन कर सकते हो। धम्म रसायण यहां पर आरंभ हो गया मित्रों कि अंग अंग अपेक्षा भेदा भेद, एक-एक अंग भिन्न-भिन्न है, इसलिए आपमें भेद है,अंग अंग अलग पर शरीर एक ही है इसलिए अभेद है। संबंध अपेक्षा भेदा भेद जाने,आप भाई भी हो, पिता भी हो और पुत्र भी हो इसलिए भेद है लेकिन आप एक ही व्यक्ति हो इसलिए अभेद है। वस्तु के अंदर भेद देखना पड़ेगा और जो वस्तु के अंदर भेद देखना जानता है, उसे वस्तु के अभेद को भी देखना आना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि चेतन में या अचेतन में वस्तुत्व नहीं होगा तो दोनों का अस्तित्व नहीं होगा। पर्याय बदल सकती है लेकिन वस्तुत्व नहीं बदलेगा, जो पर्याय रहेगी तो वस्तुत्व रहेगा ही। जैसे मनुष्य आपकी पर्याय है, इस मनुष्य पर्याय में मनुष्यत्व है, मिश्री मीठी है तो मीठासत्व है, मित्रों जो वस्तुत्व है वह वस्तु के गुणों की व्याख्या कर रहा है। ऐसा कुछ भी जगत में नहीं है जिसमें वस्तुत्व न हो, बिना वस्तुत्व के वस्तु होती ही नहीं है।
आचार्यश्री ने कहा कि आज धनत्रयोदशी नहीं है,धन्य त्रयोदशी है। आज के दिन भगवान महावीर स्वामी कैवल्य को प्राप्त किया था,ध्यान की चरम सीमा में पहुंचकर वर्धमान ने आत्म को वर्धमान किया,उत्कृष्ट किया। यदि एक प्रवचन विश्व के व्यक्ति को समझ आ गया तो यह चातुर्मास की सफलता है। आज ऐसा लगता है संपूर्ण विश्व की भाषा हिंदी होती,कितना मिठास हिंदी में है या प्राकृत होती, बहुत मीठी भाषा है, सारा विश्व समझता,लोग समझते इस बात को कि यदि लगता है आपको कि मैं विशेष आदमी हूं,तो ध्यान दें कि विशेषताएं बढ़ती जाए और सामान्य से हटो न,उसका नाम योगी व धर्मात्मा है।
परस्पर में जीवों के साथ हित-मित प्रिय वचन बोलो : मुनिश्री यशोधर सागर जी महाराज
मुनिश्री यशोधर सागर जी ने कहा कि यदि आपको घर सुख पूर्वक चलाना है तो आप स्वयं जिओ और औरों को भी जीने दो,अगर आपने अपनी सासू की बेटी को परेशान किया तो वह घर छोड़कर चली जाएगी, इसलिए सूत्र है परस्परोपग्रहो जीवानाम। परस्पर में जीवों के साथ हित-मित प्रिय वचन बोलो, हर व्यक्ति को सम्मान देना सीखो और हर व्यक्ति से सम्मान लेना सीखो। यदि आपके पास सम्मान देने की शक्ति नहीं है तो मध्यस्थ हो जाओ,लेकिन कुछ मत बोलो,यदि कुछ बोलोगे तो व्यक्ति का दिल उदास हो जाएगा,हृदय टूट जाएगा, आने की इच्छा नहीं रखेगा,फिर कहां लोग इस सभा में भी आएंगे। कुरल काव्य क्लास में आचार्यश्री ने कहा कि पुण्य आत्मा जीव को अंदर से मुस्कुराहट आती है,जो व्यक्ति टेंशन में होता है उसको मुस्कुराहट नहीं आती है। अंदर से वही व्यक्ति मुस्कुराता है,जिस व्यक्ति के अंदर समता है, साम्य भाव है। ज्ञानियों अपना पुण्य बनाओ कि यहां धरती के देवता आपके पास आए हैं, इनका स्वागत करो, इनका सम्मान करो और अपने जीवन को धन्य बनाओ।
आचार्यश्री के ससंघ सानिध्य में चूड़ीलाइन मंदिर में होने वाले पंचकल्याणक की पत्रिका का विमोचन
विशुद्ध वर्षा योग समिति के अध्यक्ष प्रदीप पाटनी एवं महामंत्री राकेश बाकलीवाल ने बताया कि 31 अक्टूबर से 4 नवंबर तक चूड़ीलाइन मंदिर का पंचकल्याणक महोत्सव आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ सानिध्य में तय हुआ है। इसकी पत्रिका का विमोचन रविवार शाम विशुद्ध देशना मंडप में आचार्यश्री के आशीर्वाद से हुआ। चूड़ीलाइन स्थित सदोदय 1008 श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर का पंचकल्याणक महोत्सव के लिए रविवार संध्या धर्मसभा में मंदिर के पदाधिकारियों और फाफडीह सन्मति नगर मंदिर व चातुर्मास समिति के पदाधिकारियों की उपस्थिति में पत्रिका का विमोचन हुआ।
अरविंद बड़जात्या, सुरेश पाटनी, सुधीर बाकलीवाल,प्रद्युमन रावका, महावीर प्रसाद बाकलीवाल, राजकुमार गंगवाल, पारस पापड़ीवाल, धर्मचंद कासलीवाल, रिखबचंद गंगवाल, संतोष काला, सनत गंगवाल, सतीश पाटनी एवं चतुर्मास कमेटी के अध्यक्ष प्रदीप पाटनी,राकेश बाकलीवाल, मनोज सेठी, अनिल बाकलीवाल,नरेंद्र जैन गुरु कृपा,प्रदीप जैन विश्व परिवार, संजय नायक, मालवीय रोड मंदिर अध्यक्ष संजय नायक, डीडी नगर मंदिर अध्यक्ष यशवंत जैन,लाभांडी मंदिर के पदाधिकारी विनोद बड़जात्या, सनत जैन, टैगोर नगर से पुष्पेंद्र जैन,कचना से अजीत जैन एवं समस्त चूड़ी लाइन गुरुभक्त परिवार की उपस्थिति में विमोचन हुआ। कार्यक्रम का संचालन अरविंद जैन ने किया। अंत में सभी गुरु भक्तों ने आचार्यश्री को अर्घ्य समर्पित कर आशीर्वाद लिया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

