“तप” करने से ही कर्मो की निर्जरा होगी, सुप्रभ साग़र जी
विदिशा
बिना बर्तन को तपाऐ दूध से मलाई और मलाई से घी प्राप्त नहीं कर सकते, तो इस मानव तन को तपाये किये मोक्ष सुख को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उपरोक्त उदगार मुनि श्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने श्री बासूपूज्य जिनालय इन्द्रप्रस्तथ कालौनी में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने तप की महिमा बताते हुये कहा कि आचार्यों ने 12 प्रकार के तप की व्याख्या की हे, इन बारह तपों में छै बाहरी तप है जो कि देखने में आते है जैसे अनशन,अवमौदर्य,

वृत्त परिसंख्यान, रसपरित्याग, कायक्लेश विविक्त शयनासन है,वही छै अन्तरंग तप जो आपके संयम और वैराग्य में दृढ़ता लाते है। जिसमें यदि कोई गलती हो गयी तो अपने गुरू के पास जाकर व्यक्त करना और प्रायश्चित्त लेना,अपने से वरिष्ठ गुणीजनों की विनय करना उनकी वैयावृत्य करना, स्वाध्याय और ध्यान तथा व्युत्सर्ग करना है। जो ऐसे बहिरंग और अन्तरंग बारह तपों को करते हुए ध्यानरूपी अग्नि के द्वारा कर्मरूपी ईधन को जला लेते है वह ही मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर पाते है। उन्होंने कहा कि सम्यक् श्रद्धा के बिना सम्यक् तप नहीं हो सकता और सभी तप भी नहीं कर सकते लेकिन आप तपस्या नहीं कर पा रहे हो तो, जो तपस्या कर रहे है उनके लिये अनुकूल वातावरण तो दे ही सकते है, यह भी एक साधू की वैयावृत्ति है,
“साधू की विनय नहीं कर पा रहे तो कम से कम अविनय तो मत करो” साधु को ऐसे स्थान पर रोको जहा उनकी चर्या और साधना के लिये अनुकूल वातावरण हो, उन्होंने कहा कि अंतरंग तप में विशेष गुण श्रद्धा का है, बिटना श्रद्धा के आपका तप बेकार है। जैसै फलदार वृक्ष में पहले फूल लगता है, और वह फूल ही फल बनता है उसी प्रकार सम्यक् श्रद्धा ही सम्यक् तप को जन्म देती है वह सम्यक् तप ही आपको बिपुल बल, ऐश्वर्य तथा स्वर्ग सुख दिलाते है। तथा परंपरा से मोक्ष सुख मिलता है। उन्होंने कहा कि “प्रमादी जीव न तो कोई कार्य समय पर खुद करते है,और न करने देते है” वह दुनिया को व्यवस्थित करने में लगे रहते है लेकिन स्वं को व्यवस्थित नहीं करना चाहते। मुनि श्री ने कहा कि “दुनिया को व्यवस्थित मत करो अपने आप को व्यवस्थित करो” भीड़ कभी कोई काम नहीं करती, काम की शुरुआत हमेशा थोड़े से लोगों से ही होती है, आपका कार्य सफल और अच्छा हुआ,तो लोग जुड़ते जाते हे। मुनि श्री ने कहा कि “कोई भी अच्छा काम करो तो शुरुआत में विघ्न आते ही है, उन विघ्नों से मत घबराना,
“तपस्या” एक श्रैष्ठ कार्य है,कोई भी श्रैष्ठ कार्य करो विघ्न आते ही है। उन विघ्नों से घबराकर अपनी श्रेष्ठ चर्या और अपने वृत संयम को और अधिक दृढ़ बनाना।
उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया प्रतिदिन प्रवचन 8:30 बजे से चल रहे है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
