पूज्य आचार्य 108 मेरुभूषण महाराज क्षपक सलेखना के साथ समाधी की ओर अग्रसर
हर संत हर श्रावक यह चाहता है की वो उन्नत रहे धर्ममय जीवन के साथ उत्कृष्ट समाधी हो तो वो भी तीर्थ क्षेत्र मे सिद्धक्षेत्र मे हो ऐसे महामंत सम्मेदशिखर तीर्थ मुनिराज मेरुभूषण जी महाराज जो सलेखना की और अग्रसर है उन्होने अपना आचार्य पद को त्याग कर अपने प्रभावक शिष्य मुनि श्री तन्मय सागर महाराज को सुशोभित किया स्वयं क्षपक मुनि बन समाधी की और अग्रसर है जीवन के अंत समय सब कुछ त्याग मुनि बनकर शरीर का ममत्व छोड़ अपना वरण कर जाना यही उत्तम समाधी है जो सिद्धतव की प्राप्ति कराता है
एक परिचय
हम अगर क्षपक मुनिराज मेरुभुषण महाराज का परिचय को जाने तो यह बहुत विशालता को लिये हुए है इनका जन्म 21 अप्रैल 1941 को हुआ इन्होने 59 वर्ष की उम्र मे 28 अप्रैल 2002 को सिहरथ प्रवर्तक विद्याभूषण आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज से बड़ागाव मे मुनि दीक्षा प्राप्त की आप संयम पद पर अग्रसर होते रहे और 10 दिसंबर 2004 को श्रवणबैलगोला मे आचार्य पद पर सुशोभित किया गया ।
सलेखना की और बडे
पूज्य गुरुदेव ने शरीर की अस्वस्थता को देख धीरे धीरे त्याग की और बढते हुए 20 अक्टूबर 2011 को सोनागिर तीर्थ पर सलेखना व्रत लिया आपने 16 जून 2022 अनेक प्रकार के रसो का त्याग कर एवम आचार्य पद का त्र्याग कर अपना आचार्य पद अपने शिष्य मुनि श्री तन्मय सागर प्रदान करते हुए स्वयम क्षपक मुनिराज हो गए
त्याग मुनि श्री
पूज्य क्षपक मुनिराज मेरुभुषण जी का त्याग बहुत विशालता को लिये हुए है इन्होने 9,99,960 वनस्पतियों का आजीवन त्याग किया हुआ है इसी के साथ उनके अनेक त्याग है और धीरे धीरे सब कुछ त्याग करते हुए उत्तम समाधी को प्राप्त करेगे और सिद्धत्व की प्राप्ति करेगे अपनी देह और मानव जीवन को धन्य करेगे
हम तो यही भावना भाते है आप उत्तम समाधी को प्राप्त हो
अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी
