उत्तम आकिंचन का सरल अर्थ अपरिग्रह त्याग से लगाया जा सकता है विनीत साग़र जी
कामा
शरीर के प्रति हमारा गहरा ममत्व है और हम इसी के पोषण में दिन रात लगे रहते हैं जबकि सबको यह विदित है कि यह शरीर आपके साथ जाने वाला नहीं है और ना ही आपका साथ देगा। शरीर का क्षरण होना है जबकि आत्मा अजर अमर है। अतः हमें बाह्यरंग के साथ साथ अंतरंग के भी परिग्रह का त्याग करना होगा और यही आज का धर्म उत्तम आकिंचन बतलाता है। उक्त कथन अपने प्रवचनों के दौरान आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर कोट ऊपर में जैन आचार्य विनीत सागर महाराज ने दशलक्षण महामंडल विधान के नौवें दिन व्यक्त किए।

आचार्य ने कहा कि उत्तम आकिंचन का सरल अर्थ अपरिग्रह के त्याग से लगाया जाता है लेकिन गूढ़ता में देखें तो संपूर्ण के प्रति मूर्छा आ जाना अर्थात आसक्ति,लगाव,हित ना रखना उत्तम आकिंचन है। आचार्य ने कहा कि मुनियों और श्रावकों के लिए परिग्रह का त्याग भी भिन्न भिन्न है मुनियों के लिए कहा गया है की *फांस तनिक सी तन में साले चाहे लंगोटी की दुख भाले है* जिस प्रकार छोटी सी फांस भी शरीर को दुख पहुंचाती है उसी प्रकार लंगोटी का परिग्रह भी संत को संसार चक्र के भ्रमण में फंसाता है। ग्रहस्थ के लिए कहा गया है कि आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना चाहिए। यदि आपके पास धन, आभूषण, संपत्ति, दुकान, मकान, जायदाद व्यापार है तो उसके घटने और बढ़ने पर समता भाव ही रखना चाहिए। लाभ होने पर अधिक प्रसन्न वह हानि होने पर अधिक दुख व्यक्त नहीं करना चाहिए।
जैन समाज से प्राप्त सूचना के अनुसार दसलक्षण महामंडल विधान के नौवें दिन सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य भागचंद देवेंद्र कुमार जैन एवं दुलीचंद शीतल चंद जैन बैनाडा परिवार को प्राप्त हुआ। विधान निर्देशिका बह्मचारीणी मणि दीदी ने कहा कि दसलक्षण पर्व दस धर्म को जीवन में उतारने की कला सिखाते हैं। शान्तिनाथ दिगम्बर जैन दिवान मन्दिर में भी उत्तम आकिंचन धर्म की पूजा आराधना व शांतिधारा की गई।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
