दान पराधीन क्रिया है निष्पक्ष सागर महाराज
खुरई
पूज्य निर्यापक श्रमण 108 संभवसागर जी महाराज संघ सानिध्य मे मह्रती धर्म आराधना हो रही पर्युषण पर्व के 8 वा दिन उत्तम त्याग धर्म के रूप मे मनाया गया इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज ने उत्तम त्याग धर्म पर बोलते हुए कहा की वस्तु को हानिकारक, अनुपयोगी जानकर खोटी वस्तुओं का ही त्याग किया जाता है। जैसे- तम्बाकू, शराब, ड्रग्स, क्रोध अादि कषायों का त्याग होता है। जबकि दान उपयोगी हितकर वस्तुओं का ही किया जाता है। जैसे-औषधि, आहार, शास्त्र, पीछी, कमण्डल आदि। जिसका त्याग कर दिया जाता है उस त्यागी वस्तु के बारे में फिर कोई विकल्प त्यागकर्ता को नहीं होता। चक्रवर्ती, तीर्थंकर अन्य राजे-महाराजे विरक्त होकर जब अपना राजपाट छोड़कर जाते हैं, तो फिर उस तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखते। तम्बाकू, शराब छोड़ने वालों को फिर कभी उनका विकल्प नहीं आता पर दान दाताओं को दिए गए दान के विषय में विकल्प आता है कि जिस उद्देश्य से दान दिया वह उसी कार्य में लगा है या नहीं। प्राचीन जैन मंदिर में विराजमान मुनिश्री निष्पक्षसागर महाराज ने पर्यूषण पर्व के आठवें दिन बुधवार को ‘उत्तम त्याग धर्म’ पर प्रवचन देते हुए कही।
उन्हाेंने कहा कि त्याग उस वस्तु पदार्थ का होता है जो पास में है और उसका भी हो सकता है जो अपने पास नहीं है। परन्तु दान अपनी ही वस्तु द्रव्य का किया जाता है, पराई वस्तु का नहीं। त्याग करने के लिए किसी अन्य की आवश्यकता नहीं होती, स्वयं अकेले ही त्याग कर सकते हैं। लेकिन दान में तीन का होना जरूरी है, दाता-देनेवाला, लेनेवाला, देय वस्तु, जिसका दान किया जाना है। किसी भी एक के बिना दान की क्रिया संभव नहीं है। दूसरे शब्दों में त्याग स्वाधीन क्रिया है, दान पराधीन क्रिया है। भले ही दान स्वीकारते हुए त्यागी का हाथ नीचे और दाता का हाथ ऊपर हो तो भी दाता से त्यागी हमेशा बड़ा होता है। दाता सम्मानीय होता है, पर पूज्यता तो उत्तमत्यागर्थी मुनिराजों में ही होती है। इसी से बड़े-बड़े दानी और राजा भी उनके चरणों में नतमस्तक होते हैं। उन्हाेंने कहा कि जिस समय द्रव्य दान करने के भव हों, उसी समय देना चाहिए। कहा भी है तुरत दान महापुण्य है। बोली लेकर बोली की राशि को लम्बे समय तक लटकाए रखना निर्माल्य के सेवन जैसा है। बिना मांगे ही विनयपूर्वक देना ही शोभनीय होता है। दान अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुसार ही देना चाहिए। देखा देखी या प्रतिस्पर्धा में शक्ति के बाहर दान देने से बाद में परिणाम में आकुलता व्याकुलता होती है। दान में मान नहीं होना चाहिए। दान में मान नहीं होता और मान में दान नहीं होता। दान प्रसन्नता पूर्वक हर्ष के साथ देना चाहिए। ऐसे दानियों को इस लोक में यश मिलता है, मान सम्मान मिलता है और परलोक में भी उसे सुख की प्राप्ति होती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
