मानव का जीवन गीली मिटटी की भाति की तरह होता है संभवसागर महाराज
खुरई
पूज्य निर्यापक श्रमण संभवसागर महाराज ने अपने उद्बोधन मे लक्ष्य निर्माण के विषय मे अपना उद्बोधन दिया महाराज श्री ने एक लोकोक्ति बोलते हुए समझाया की मानव जीवन गीली मिट्टी, किस मौसम गल जाएगी। जैसा सांचा होगा, वैसी मूरत यह ढल जाएगी।। अर्थात् मानव का प्रारंभिक जीवन गीली मिट्टी की भांति हुआ करता है। वह उसे जैसा चाहे वैसा आकार प्रकार दे सकता है चाहे तो वह शैतान का पुतला बना सकता है और चाहे तो देवता। वह जैसा विचार करता है उसी रूप से उसके जीवन का निर्माण होता चला जाता है।
मानव संसार में एक ऐसी कृति है, जो बुद्धि में सबसे श्रेष्ठ है, प्रतिभा में असीम है,
पूज्य मुनि श्री ने मानव को संसार की अनुपम कृति बताते हुए कहा की मानव संसार में एक ऐसी कृति है, जो बुद्धि में सबसे श्रेष्ठ है, प्रतिभा में असीम है, रूप और आचरण की दृष्टि से अग्रणीय एवं प्रशंसनीय है। उसकी कृतियां एवं कर्म आश्चर्यजनक हैं, उद्देश्य महान हैं। उन्होने आगे कहा जिस प्रकार मिट्टी में उर्वरा शक्ति छिपी होती है जिससे बहुमूल्य वस्तुएं एवं फसल पैदा होती है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य में भी ऐसी अद्भुत अनंत शक्ति छिपी होती है, जिसका उपयोग करके वह पुरूषार्थ के बल पर हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं यह नर से नारायण बनने की भी योग्यता रखता है। प्रत्येक व्यक्ति काे अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए एक निश्चित उद्देश्य निर्धारित करना पड़ता है।
व्यक्तित्व निर्माण पर जोर
पूज्य मुनि श्री ने व्यक्तित्व निर्माण पर जोर देते हुए कहा जो व्यक्ति लक्ष्य-निर्धारित किए बिना व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहता है वह बहुत बड़ी भूल कर रहा है। उद्देश्य विहीन दिशा में किया गया अथक परिश्रम, नष्ट हो जाता है एवं साथ ही साथ समय व धन सब कुछ व्यर्थ चला जाता है, क्योंकि बिना लक्ष्य के सफलता का कोई अर्थ या अस्तित्व नहीं है। जहां लक्ष्य है वहां प्रयास का मूल्य है और उसमें सफलता पाने के लिए प्रभावशाली व आकर्षक व्यक्तित्व की आवश्यकता है। उन्हाेंने कहा कि लक्ष्य निश्चित करने के लिए हमें मन और विवेक को जागृत करना होगा। लक्ष्य निर्धारण जीवन को श्रेष्ठ ही नहीं बनाता बल्कि उसमें हर्ष, उमंग, उत्साह, जोश और ओज के विभिन्न रंग भी भरता है। जीवन भी एक कला है इसलिए बेहतर यही होगा कि इस कला को श्रेष्ठ से श्रेष्ठ नीति और लक्ष्य अनुगामी होने दो। हमारा लक्ष्य वास्तविक, कल्याणकारी एवं आत्मा की उदारता से ओत-प्रोत होना चाहिए। उन्हाेंने कहा कि क्षणभंगुर लालसाओं और उनकी तृप्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। जो अभी है, अभी नहीं है, जिनके रंग-रूप पल पल बदलते हैं, जिनके पूरी होने से मिलने वाली तृप्ति, नहीं पूरी होने से मिलने वाली अतृप्ति गहरा अवसाद एवं विषाद देती है, ऐसी क्षणभंगुर माया-मरीचिका भला जीवन का लक्ष्य कैसे हो सकती है। लक्ष्य तो सदा शाश्वत सार्वकालिक एवं शांतिदायक होना चाहिए। जीवन का लक्ष्य, आजीविका का निर्वाह मात्र न होकर जीवन का निर्माण भी होना चाहिए। अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाओ और इसके बाद सारा शारीरिक और मानसिक बल उसमें लगा दो। उन्नत होना और आगे बढ़ना प्रत्येक जीव का लक्ष्य होना चाहिए।
संकलन अभिषेक जैन लूहाडीया रामगंजमंडी
