-संतोषी व्यक्ति सदा सुखी रहता है -मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ईश्वरवारा–

सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस शुक्रवार को विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि पुंगव सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि जो परमसुख चाहने वाला हो,उसे परम संतोषी होना चाहिए। क्योंकि संतोष ही समस्त सुखों का मूल है और लोभ समस्त दुखों का मूल कारण है।मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी बढ़कर है।मुनि श्री ने कहा कि यदि मन में संतोष भली-भांति प्रतिष्ठित हो जाए तो उस से बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है ।जैसे जल के बिना नाव करोड़ यत्न करने पर भी नहीं चल सकती, उसी प्रकार संतोष बिना कभी शांति नहीं मिल सकती। विपत्तियों के दिनों में निराश ऊपर नहीं बैठना चाहिए,बल्कि संतोष धारण करना चाहिए। क्योंकि संतोष रूपी अमृत से संतुष्ट मनुष्य के लिए सतत सुख और शांति के द्वार खुले रहते हैं। मुनि श्री ने कहा कि असंतोष ही सबसे बड़ा दुख है और संतोष ही सबसे बड़ा सुख है अतः सुख चाहने वाले पुरूष को सदा संतुष्ट रहना चाहिए। संतोष साम्राज्य से भी बढ़कर है।संतोष वह पारस पत्थर है ,जो जिस वस्तु को छूता है, उसे सोना बना देता है। मुनि श्री ने कहा कि दान के समान दूसरी निधि नहीं है। लोभ के समान दूसरा शत्रु नहीं है, शील के समान कोई भूषण नहीं है। और संतोष के समान दूसरा धन नहीं है। जिसके मन में संतोष है उसके लिए सब जगह संपन्नता है।लोभी पूर्ण संसार पाने पर भी भूखा रहता है। किंतु संतोषी एक रोटी से भी पेट भर लेता है। संपूर्ण पापों का पिता बस लोभ को ही जानिए।विश्व में अत्याचार, अनीति ,अधर्म, आतंकवाद आदि इन सब का कारण है कि व्यक्ति अधिक लालची हो गया है। अधिक लालच से बुद्धि का अंधा हो जाना, सभी मुसीबतों का कारण है।
16अर्घ किए समर्पित.किये गए

वही इस अनुपम बेला में मुनि श्री सुधासाग़र महाराज,मुनि श्री पूज्य सागर महाराज, ऐलक श्री धैर्य सागर महाराज, क्षुल्लक श्री गंभीर सागर महाराज, के सानिध्य एवं ब्रहमचारी प्रदीप भैया सुयश अशोकनगर, ब्रह्मचारी गौतम भैया के मार्गदर्शन में सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस शुक्रवार को 16 अर्घ समर्पित किए गए।

प्रचार- प्रसार समिति के प्रमुख अशोक शाकाहार ने बताया कि विधान के तृतीय दिवस शनिवार को 32 अर्घ समर्पित किए जाएंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
