प्रतिभा सबमें है, बस उसे पहचानने वाली नज़र चाहिए : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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प्रतिभा सबमें है, बस उसे पहचानने वाली नज़र चाहिए : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

अपनी विशेषताओं को पहचानें, दूसरों की प्रतिभा का सम्मान करें और समाज के कल्याण में करें उसका उपयोग : आचार्यश्री

पुष्पगिरी तीर्थ पर औरंगाबाद जैन समाज के पूर्व पदाधिकारियों एवं समाजजनों ने किए संतों के दर्शन, प्राप्त किया मंगल आशीर्वाद

औरंगाबाद/सोनकच्छ।

पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। संतों के पावन सानिध्य में तीर्थ पर प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक गतिविधियां आयोजित हो रही हैं। इसी श्रृंखला में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने प्रतिभा के महत्व पर प्रेरणादायी प्रवचन देते हुए कहा कि इस दुनिया में कोई भी इंसान प्रतिभाहीन नहीं है। हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई विशेषता, अनोखी क्षमता और कुछ कर दिखाने की शक्ति छिपी होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी की प्रतिभा को दुनिया पहचान लेती है, तो किसी की प्रतिभा पहचान मिलने के इंतजार में ही रह जाती है।

 

 

 

आचार्यश्री ने कहा कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती और हर साधारण दिखने वाला इंसान वास्तव में साधारण नहीं होता। कई बार हीरे की कीमत इसलिए नहीं लग पाती, क्योंकि उसे परखने वाला जौहरी नहीं मिलता। इसलिए किसी व्यक्ति की बाहरी परिस्थितियों या साधारण वेशभूषा को देखकर उसकी क्षमताओं का आकलन नहीं करना चाहिए।

आत्म-पहचान ही आत्मविश्वास की जननी

आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ विशेष अवश्य होता है। जब तक हम अपनी प्रतिभा को नहीं पहचानेंगे, तब तक दूसरों की नकल करते रहेंगे। अपनी क्षमताओं को पहचानना ही आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी है। दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए। गुलाब और गेंदा दोनों फूल हैं, लेकिन दोनों की सुंदरता और विशेषता अपनी-अपनी है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग पहचान और उपयोगिता है।

प्रतिभा को निखारने के लिए प्रोत्साहन जरूरी

उन्होंने कहा कि परिवार, शिक्षक और समाज की जिम्मेदारी है कि वे प्रत्येक व्यक्ति के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानें और उसे आगे बढ़ने का अवसर दें। जिस प्रकार एक बीज को वृक्ष बनने के लिए धूप, पानी और खाद की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार प्रतिभा को निखारने के लिए प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और विश्वास की जरूरत होती है। कभी-कभी किसी व्यक्ति के लिए कहा गया एक छोटा-सा प्रोत्साहन भरा शब्द ‘शाबाश’ भी उसकी पूरी जिंदगी बदल सकता है।

प्रतिभा की सार्थकता समाज के काम आने में

आचार्यश्री ने कहा कि प्रतिभाशाली होना बड़ी बात है, लेकिन अपनी प्रतिभा से किसी दूसरे के जीवन में उजाला करना उससे भी बड़ी बात है। प्रतिभा का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका उपयोग केवल स्वयं की उन्नति के लिए नहीं, बल्कि समाज और दूसरों के कल्याण के लिए भी किया जाए। अपनी क्षमताओं को ऐसा माध्यम बनाएं, जिससे जरूरतमंदों को सहयोग मिले और समाज में सकारात्मक परिवर्तन आए।

प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि अपने भीतर छिपे हीरे को पहचानें, दूसरों के भीतर की चमक का सम्मान करें और अपनी प्रतिभा से ऐसा प्रकाश फैलाएं कि आपके होने से किसी दूसरे का जीवन भी रोशन हो जाए।

औरंगाबाद जैन समाज के प्रतिनिधियों ने किए दर्शन

इस अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ पर औरंगाबाद जैन समाज के पूर्व अध्यक्ष ललित पाटणी एवं मनीषा पाटणी, पूर्व उपाध्यक्ष विनोद लोहाड़े एवं सुनीता लोहाड़े, विश्वस्त महेंद्र ठोले एवं राणी ठोले, उमेश चुडिवाल एवं आशा चुडिवाल सहित समाज के अन्य श्रद्धालुओं ने उपस्थित रहकर अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज, गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज के दर्शन कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

उक्त जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी।

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