# केशवरायपाटन में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन: विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय पर हुआ मंथन, गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने बताई जैन दर्शन की सूक्ष्म दृष्टि
**आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और भारतीय अध्यात्म-दर्शन के संबंधों पर देशभर के वैज्ञानिकों ने रखे विचार, एआई सहित विभिन्न विषयों पर हुई चर्चा**
**केशवरायपाटन।**
राजस्थान के केशवरायपाटन स्थित मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में गणिनी आर्यिका 105 स्वस्ति भूषण माताजी के सानिध्य में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन में देशभर से आए वैज्ञानिकों एवं विषय विशेषज्ञों ने आधुनिक विज्ञान, नवीन अनुसंधान और भारतीय अध्यात्म-दर्शन के बीच संबंधों पर विचार व्यक्त किए। सम्मेलन में इस बात पर विशेष चर्चा हुई कि विज्ञान जहां प्रयोगों और अनुसंधान के माध्यम से बाहरी जगत के रहस्यों को समझने का प्रयास करता है, वहीं अध्यात्म मनुष्य को आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और जीवन के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है।
### आत्मज्ञान और केवलज्ञान की अवधारणा पर किया प्रकाश
गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने भगवान महावीर के उपदेशों और जैन दर्शन में ज्ञान की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने आत्मशुद्धि और कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया। जैन दर्शन के अनुसार, केवलज्ञान वह सर्वोच्च ज्ञान है, जिसमें तीनों लोकों के समस्त पदार्थों और उनकी अनंत पर्यायों का पूर्ण ज्ञान होता है।


माताजी ने कहा कि ज्ञान आत्मा का गुण है। विज्ञान भी ज्ञान की खोज और उसके व्यवस्थित अध्ययन से जुड़ा है। वैज्ञानिक प्रयोगों, परीक्षणों और अनुसंधानों के माध्यम से जीव-जगत, पदार्थों तथा प्रकृति के रहस्यों को समझने का प्रयास करते हैं। वहीं, जैन दर्शन आत्मशुद्धि और कर्मों के आवरण से मुक्त होकर ज्ञान की पूर्णता प्राप्त करने की अवधारणा प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से विज्ञान और अध्यात्म के अध्ययन के क्षेत्र अलग-अलग होते हुए भी ज्ञान की खोज के व्यापक विषय से जुड़े हैं।


### वनस्पतियों में जीवन से लेकर सूक्ष्म पदार्थों तक की चर्चा
माताजी ने आधुनिक विज्ञान और जैन दर्शन के संदर्भ में वनस्पतियों में जीवन की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन दर्शन में वृक्षों और वनस्पतियों को एकेंद्रिय जीव माना गया है। उन्होंने इसे जीव-जगत के प्रति जैन दर्शन की सूक्ष्म दृष्टि का उदाहरण बताया।


अणुओं की संरचना और सूक्ष्म पदार्थों के विषय में चर्चा करते हुए माताजी ने कहा कि आधुनिक विज्ञान निरंतर नए अनुसंधानों के माध्यम से पदार्थों के स्वरूप और उनकी विशेषताओं को समझने का प्रयास कर रहा है। वहीं, जैन दर्शन में सूक्ष्म विषयों के ज्ञान के संदर्भ में अवधिज्ञान और केवलज्ञान जैसी अवधारणाओं का उल्लेख मिलता है। मनःपर्यय ज्ञान को दूसरे जीव के मन में स्थित विचारों एवं भावों को जानने से संबंधित बताया गया है।
### कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक विज्ञान पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। वैज्ञानिकों ने ज्ञान-विज्ञान के विकास, नई तकनीकों की भूमिका और मानव जीवन में उनके प्रभाव जैसे विषयों पर चर्चा की।
सम्मेलन ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भारतीय दार्शनिक परंपरा के बीच संवाद को एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। इसमें ज्ञान की विभिन्न धाराओं को समझने, उनके मूल उद्देश्यों पर विचार करने तथा मानव जीवन में उनकी उपयोगिता को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर जोर दिया गया।
### ज्ञान के साथ विनम्रता और आत्मचिंतन भी आवश्यक
गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी ने कहा कि विज्ञान बाहरी जगत के रहस्यों को समझने का माध्यम है, जबकि अध्यात्म मनुष्य को अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा प्रदान करता है। ज्ञान के साथ विनम्रता, विवेक और आत्मचिंतन का समावेश होने पर व्यक्ति की दृष्टि व्यापक बनती है।
उन्होंने भगवान महावीर के संदेश का उल्लेख करते हुए आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त कर उसके शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति को जैन दर्शन का प्रमुख उद्देश्य बताया।
केशवरायपाटन में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन आधुनिक अनुसंधान और भारतीय अध्यात्म-दर्शन के बीच संवाद, चिंतन और ज्ञान के आदान-प्रदान की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा।
**संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**
