हर मुस्कुराता चेहरा आपका शुभचिंतक नहीं होता, लोगों को परखना भी सीखें : अंतर्मना आचार्यश्री प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

हर मुस्कुराता चेहरा आपका शुभचिंतक नहीं होता, लोगों को परखना भी सीखें : अंतर्मना आचार्यश्री प्रसन्न सागरजी महाराज

 

मौन साधना के दौरान लिखित संदेश में दिया जीवन को सुख, शांति और संतोष से जीने का संदेश; बोले—दुःख के लिए संसार को दोष न दें, अपने मन को समझाएं

पुष्पगिरि

“अब लोगों को परखना भी सीख लो, क्योंकि हर मुस्कुराता चेहरा तुम्हारा भला नहीं चाहता।” व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्यश्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने मौन साधना के दौरान अपने लिखित संदेश में जीवन की गहरी सीख देते हुए यह प्रेरक विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाले कष्टों, पीड़ाओं और परेशानियों के बीच धैर्य बनाए रखना चाहिए तथा अपने मन को समझाकर सुख, शांति और संतोष के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

 

 

पुराने कर्मों का हिसाब समझकर धैर्य रखें

 

आचार्यश्री ने अपने संदेश में कहा कि यदि आज कोई कष्ट, पीड़ा, तकलीफ या परेशानी आपका पीछा नहीं छोड़ रही है, तो यह मानकर चलिए कि पुराने कर्मों का हिसाब हो रहा है। ऐसे समय में धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना आवश्यक है। प्रभु और गुरु के अलावा किसी के सामने अपने मन का दुखड़ा रोने और शिकायत करने के बजाय आत्मचिंतन करना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि अपनी दुःख-पीड़ाओं के लिए संसार को दोष नहीं देना चाहिए। मन को समझाना और उसकी दिशा बदलना सीखना चाहिए, क्योंकि सुख-दुःख का संबंध मन की अवस्था से भी है। मन में सकारात्मक परिवर्तन ही मनुष्य को सुख, शांति और संतोष के साथ जीवन जीने की राह दिखा सकता है।

 

जीवन को बोझ नहीं, उपहार समझकर जिएं

 

आचार्यश्री ने जीवन की महत्ता बताते हुए प्रेरक पंक्तियों के माध्यम से जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश दिया—

 

जिंदगी एक उपहार है, उपयोग कीजिए।

जिंदगी एक एहसास है, महसूस कीजिए।

जिंदगी एक दर्द है, सहन कीजिए।

जिंदगी एक प्यास है, खोज कीजिए।

जिंदगी एक सफर है, मुस्कुराकर पूरा कीजिए।

जिंदगी एक उपवन है, इसकी खुशबू लीजिए।

जिंदगी उत्सव है, इसे उत्साह से जी लीजिए।

 

उन्होंने संदेश के माध्यम से यह भाव भी व्यक्त किया कि जीवन एक सुहाना सफर है। यहां आने वाले कल में क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। इसलिए बीते हुए कल के दुखों में उलझने और भविष्य की अनावश्यक चिंता करने के बजाय वर्तमान को सार्थक बनाना चाहिए।

 

आचार्यश्री के संदेश का सार यही है कि जीवन में विवेक से लोगों को पहचानें, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखें, अपने मन को सकारात्मक बनाएं और प्रत्येक परिस्थिति में आत्मचिंतन का मार्ग अपनाएं। जीवन को शिकायतों में नहीं, बल्कि संयम, संतोष, मुस्कान और उत्साह के साथ जीना ही सच्ची समझदारी है। सप्तम पारणा

 

तेरह द्वीप जिनालय व्रत का सप्तम पारणा तीन (3) निर्जल उपवास का आज 12 अक्टूबर सोमवार को निरतंराय सम्पन्न हुआ

 

पट्ट विभूषण व्रत चक्रवर्ती साधना महोदधि तपाचार्य गुरुदेव अंतर्मना 108 श्री प्रसन्न सागरजी महाराज जी

 

‘अगला पारणा 17 अक्टूबर (शनिवार) पुष्पगिरी तीर्थ क्षेत्र सोनकच्छ जिला देवास मध्यप्रदेश

 

— जानकारी : नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबाद। से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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